दरबारी संस्कृति और हिन्दी मुक्तक | Darabari Sanskriti Aur Hindi Muktak

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Darabari Sanskriti Aur Hindi Muktak by श्रीकृष्ण लाल - Shree Krishn Laal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपनी ओर से-- डिन्दी पूर्व मध्यकाल अथवा भक्तिकाल के चीच से प्रबन्ध काव्य अधवा महा काव्य को स्वस्थ परम्परा सहसा क्यों छप्त हो गई तथा श्थज्ञारिक मुक्तकों की एक प्रकार से चाद सी आ गयी, यह प्रभ और भी हिन्दी-विद्वानों के चिंता का विपय बना होगा किन्दु एक हिन्दी का विद्यार्थी होने के नाते मुझे बराबर इसके कारण के प्रति जिज्ञासा वनी रही । अपने “शोध प्रचन्थ' के सिलसिले में जब मुझे सस्क्त साहित्य का मी आलोड़न करना पडा, तो हिन्दी सुक्तकों के विकास का रहस्य सरी समझ मे पूर्णतः आया, जिसे प्रस्वुत पुस्तक मे व्यक्त कर सका हूँ अथवा नहीं, सद्ददय विद्वान पाठक ही बतला सकते ईं। हिन्दी सुक्तक स्वना काल की सीमा की उपेक्षा करके जो मुझे तथ्य सामने लाने पडे है उससे कंहीं कहीं पुस्तक की विषय सम्बन्धी एकता छिननमिन्न अवब्य हो गयी है, किन्तु यदि उदास्ता पूर्वक विचार किया लायगा तो उनका पारस्परिक सम्बन्ध स्पष्ट दिखाई पड़ेगा । इतना अवश्य है, कि यदि पाठक चाहें तो प्रमुख प्रसगों से स्वतंत्र निवंधों का भी रस ले सकते हैं । अपनी भोर से विशेष न कह कर मैं, शेष पुस्तक की दाक्ति पर ही छोड़ देना उचित समझता हूँ । इतना अवश्य कह देना चाहता हूँ, कि प्रस्तुत पुस्तक कतिपय विद्वानों एवं मित्रों की प्रेरणा एवं सद्धावना का परिणाम है । गुरुवर डा० श्री कृष्ण लाल ने अपने अमूल्य सुझावों के साथ साथ वृददत भूमिका लिखकर पुस्तक को यगोसवान्वित फिया है, जिसकी तुलना में आमार प्रकट करना कोई मूव्य नहीं रखता । मेरे अभिन्न मित्र श्री गोवद्धनलाठ उपाध्याय ( सहायक मंत्री नागरी प्रचारिणी सभा काणी ) ने समय-समय पर मेरी जो सहायता की है उसके छिये में अत्यन्त सामारी हूँ । प्रिय भाई सुदमंगल सिंद, माकण्डेय सिंह, श्रीघर सिंह और राजदेव सिंह ने रात-रात मर जग कर जो पुस्तक को निर्दोष बनाने में योग दिया है, उसके लिये वे सम्मवतः आभार भी स्वीकार नहीं करना चाहेंगे, किन्तु मुझे तो अपना कर्तव्य करना ही है । प्रिय टिनेशकुमारदार्मा को सेरी स्चनाओं के साथ विशेष दिलचस्पी रहती है, जिसके लिये में अदन्त कृतन हूँ । सबसे बडी वात नो मेरे लिखने में सहायक है, वह भाई श्री कृप्गच्द्र जी वेरी का मधुर आग्रह ही हो सकता दै, जिसके कारण लेखक की कठिनाइयों से मे आज तक भी अपरचित हूँ । माई अमरनाथनी पाण्डेय ने मेरी न्रह्म लिपि की टाइप कांपी तंयार की और प्रिय इन्ट्रेंजसिह ने उसे सुघारा है, जिसके लिये दोनों ही त्रघाई के पात्र हैं। इसके अतिरिक्त जिन चिद्यानो, मित्रों, एवं अ्रन्थों से लाने अनजाने सुझे सद्दायता मिली है, उनके प्रति में अत्यन्त झतन हूँ । खानजहों पुर र्लागगढ़ त्रिमुबन सिंद आश्विन झुक प्रतियदा सन २०१५




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