गीता अध्ययन | Geeta Adhyyan

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Geeta Adhyyan by दीनानाथ भार्गव - Dinanath Bhargav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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और तुम्हारे अन्दर अपने आपको भर देगी, परन्तु यदि तुम अपने मन को ही झशुवा बनने दोगे जिसमें वही तुम्हारे लिये सोचे विचारे और कततव्य का निश्चय करे तो मागवत-शक्ति से तुम्हारा सम्पक छूट जायगा ।' प्जो निस्संकी व होकर अपने सब अड्डों समेत ब्यपने आपको भगवान्‌ के झर्पण कर देते हैं उन्हें भगवान भी अपने को दे देते हैं। उन्हीं फे लिये शान्ति है, प्रकाश हैं. शक्ति हैं, मज्जल है, मुक्ति है; विशालता है; ज्ञान है, आनन्द-सुधा-सिन्घु-समूद है |' यही है. कर्म दर] सगवान्‌ के प्रति आरम-समपंण जो गीता हमें सिखाती है। उआत्म-समर्पण, धर्म की दीक्षा का प्रथम स्तर है। बआत्म-समपंण की प्रथम किरण ही मानवमन को प्रकाश से भर देती है। श्रात्म- समपश करनेवाला अपने शरीर को ईश्वरीय शक्तियों का सत्र चनाता है। सम्पूर्ण शक्तियों का विकास आत्म-समपंण से होता है [ १९.




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