अथर्ववेद - एक साहित्यिक अध्ययन | Atharvaved - Ek Sahityik Adhyayan

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Atharvaved - Ek Sahityik Adhyayan  by मातृदत्त त्रिवेदी - Matridatt Trivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१६) पो्दू्घतिं हैं जो राजा के लिए श्रयर्वागुर को वरण करने के लिए कहते हैं। उनके अनुसार राजा वा अ्रयर्वायुरु ही राष्ट्र को सुख-समृद्धि प्रदान कर सकता है। यहां यह भी कहा गया है कि जिस राजा का श्रथवंवेदवित्‌ गुरु नहीं होता है, उसकी दी हुई हृविप्‌ को न तो देवता ग्रहण करते हैं, न पितर ग्रौरन ब्राह्मण हो। ऋग्वेदी तो राष्ट्र को नष्ट कर देते है; यजुर्वेदी पुत्नों का बिनाश करता है श्रौर सामवेदी घन नाश करता है । अतः: गुरु तो आाथवंण ही होना चाहिए। पैप्पलाद ग्रर्थात्‌ भझ्रथवंवेद की पैप्पलादशाखा में निष्णात श्र छौनकी श्रर्थात्‌ शौनक शाखा में पारंगत हो गुरु करना चाहिए; क्योंकि इसी से लक्ष्मी, र ष्ट तथा झ्रारोग्य श्रादि का वर्घेत हो सकता है- न हुविः प्रतिगृह्डन्ति देवता: पितरो दिजा: । तस्य. भुभिपतेयंत्य मृहे नाथवंविदू गुरु: 11 समाहिनाज़ प्रत्पड्ध विद्याचारगुणार्वितम्‌ 1 पप्पलादं.. गुरूं .. कुर्याच्छीर'प्ट्रारोग्यवर्धनम ॥। तथा. शौनकिनें वापि.. वेदमन्त्रविपदिचितमु । राष्ट्ररप चुद्धिकर्तारंं घनघाग्यादिसि: सदा ॥ दहुवूचो हन्ति.. वे. राष्ट्सध्वर्युर्नाझायेत्सुतान्‌ । छन्दोगो घननाशाय.. तस्सादाथदंणों गुरु : । नााराष्ट्रसंवर्ग २.३.४-५४ २.४ १,३े एक श्रन्य परिकिप्ट ( पुरोहितक्सेपरिदिष्ट--संख्या ४ ) भी राजा के लिए श्थर्वागुरु को ही उचित बताता है , जो उसके शान्तिक पौष्टिक कर्मों को कर सके । जहां वह रहता है, व राष्ट्र निरुपद्रव होकर वृद्धि को प्राप्त करता है श्रौर जहाँ वह नहीं रहता, वह राप्ट्र उसी प्रकार पीड़ित होता है, जिस प्रकार पंक में फंसी हुई गाय। इसलिए राजा को चाहिए कि चह श्रवर्ववेदवित्‌ जितेन्द्रिय गुरु को दान, सम्मान तथा सत्कार श्रादि से पूजितर करे श्रौर जो राजा ऐसा करता है वह स्वेदा ही सुख को प्राप्त करता है शभ्रौर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता है- यस्य राज्ञो जनपदे श्रयर्वा शा तिपारग: | निवसत्पपि. तदुराप्ट्र चचंते निरुश्द्रवमू ॥। यस्प राज्ञो जनपदे स नाश्ति विविध॑भय: । पीड्यते तस्प तह्ाष्ट्र पड़े गोरिव मज्जति 1!




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