1960 के बाद की हिंदी कविता में विद्रोही चेतना | 1960 Ke Baad Hindi Kavita Vidrohi Chetna

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1960 Ke Baad Hindi Kavita Vidrohi Chetna by श्रीकृष्ण तिवारी -Shrikrishna Tiwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कौई नयी 'व्यवस्था स्थाप्पित कर दी जाती हे, तो वह सदेव निर्िर्विवाद नहीँ रहती । स्वार्थी तत्व उस व्यवस्था में पिसंगतियाँ उत्पन्न करते रहते हैं, फ्लत: दिद्रीह हीता रहता हे । दिद्रोह एवं क़ानिन्त की प्राय: एक ही समझा जाना स्वाथाधकि है, क्यौींकि दोनों मैं व्यापकता का ही अन्तर है, कोई वर्गगत अन्तर नहीँ । हम कह सकते हैं कि कुिन्त एक व्यापक दिद्रोह है । एक व्यापक समूह जब व्यवस्था के किसी अंग के प्रति नहीँ आील्क पूरी व्यवस्थाके प्रति विद्रोह करता हे और उसे समाप्त करके नयी व्यवस्था कायम करता है, तो उसे कुगन्त कहते हैं । लेकिन दिद्रोह के साथ स्सा नहीं है कि नजिस व्यवस्था की जिस चिसंगतति के प्रीत विद्रोह किया जाय, वह समाप्त ही ही जाय और उसके स्थान पर संगत्ति आ ही जाय । लेकिन कुपानिन्त मैं परिवर्तन हेता है, यदि परक्तन नहीँ हुआ तो कुान्त कैसी १ विद्रोह एवं क़ान्त को ज्यादा दूर तक एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता 1 च्चारकी ने विद्रोह को कृपीन्त की अपेक्षा ज्यादा बेहतर माना हे और उसको ज्यादा समर्थन भी दिया है । अपनी पुस्तक पीद रिरवेल ' में कामू ने कहा है कि कुपन्त के द्वारा जब अपेक्षाकृत एक मानवीय व्यवस्था स्थापित ही जाती है तो क़ानिन्त - कारी उस व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है । उसकी भूकमिका और चरित्र बदल जाता हे । वह कुगन्तकारी न रहकर व्यवस्थापक ही 'जाता है । सोचियत स्स का उदाहरण देते हुए कामू ने लिखा है कि लेनिन के समय के सोवियत रस में क़ानिकारियों मैं जारशादी के चिस्द्ध दिद्रोह किया था । लेकिन नयी व्यवस्था स्थापित ही जाने पर वे 'व्यवस्थाषक ही गये और उस व्यवस्था मैं आायी चिसंगतियाँ की खिलाफ्त करने वाले बुख रन आदि को उन्दींने समाप्त कर दिया । विद्रीह को कृिन्त की अपेक्षा बेहतर बताते दुए रजनीश ने लिखा है -'बगाक्त वात्मा का लन्म है । - - - -




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