भारती कवि विमर्श | Bhaarti Kavi Vimarsh

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Bhaarti Kavi Vimarsh by रामसेवक पाण्डेय - Ramsevak Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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महाकचवि कालिदास महदाकवि कालिदास सरस्वती के वह वर पुत्र है, जिनके कथबित्व की ख्याति उनके जीवन-काल से प्रारम्भ होकर युर्गों-युगों तक हुई आर भविष्य से भी होती रहेगी । इसके प्रमाण समय- मय पर कवियों और साहिस्य-म्मज्ों द्वारा बिरचित प्रशस्तियाँ हैं। कुमारिल मटर जैसे दाशनिक और धर्मा चा्यय ने उनकी सूक्तियों का उल्लेख कर उनके प्रति समादर प्रदर्शित क्रिया है। भारत के बाणभट्र, जयरेव, गोवद्धना चाय्य आदि कवियों ने यदि मुक्त- करणठ से उनकी प्रथंसा की हैं तो पश्चिम के गेटे, हस्बोल्ड,, विलियस जोन्स आदि ने भी उनका गुणगान किया है । यद्यपि ऐसे विश्व-कवि से अखिल ऐथिवी को गये है तथापि भारत का, जो कि वतमान युग में सम्य देशों से पिछड़ा हुआ है, सुख विशेष: रूप से उज्ज्जल हत्आा हैं । कि है कि हसें उनके बाह्य स्वरूप का कोई परिचय नहीं 1. मालूम नहीं कि वे साँवले थे या गोरे, मोटे थे या दबल, नाटे थे या लॉबे, शिर पर कसा उष्णीप रहता था, कंसा उत्तरीय् पहनते थे , उनके माता-पिता आर गुरु कोन थे, जन्म-भूसि कहाँ थी ओर वे किस वातावरण में पते थे । इन सब बातों के जानने के लिए कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं । उन्होंने अपने विषय में कुछ भी नहीं लिखा । इसका एकमात्र कारण यहीं सालम होता है कि वे लोकेवणा शून्य, कणाद, गांतम आईडि ऋषियों के अनुयायी. थे, जो अपने विषय से सर्वथा मौन हैं । मले ही उनके बहिजंगतू का ज्ञान हमे न हो तो भी उनके: ग्रन्थों से उनकी झात्मा का दशन होता है;. उनका जीवन स्प&ट: बस, मलकता है; विचारों आर रुचि का पता चलता हूं | उनके काव्यां. ि




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