प्राच्य और पाश्चात्य | Prachya Aur Pashchatya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्राच्य ओर पाश्धात्य ७ मोक्ष का सामच्जस्य था । उस समय यहाँ मोक्षाकांक्षी ब्पास, झुक तथा सनकादि के साथ साथ घम के उपासक युर्धिष्टि, अजुन, दुर्योधन, भीष्म और कण भी वतमान थे | बुद्देव के बाद घर्म एकदम अनाइत सा हो गया तथा केवल मोक्षमाग ही प्रधान बन गया । इसीलिए नग्निपुराण में रूपक के ब्याज से कहा गया हे कि जब गयासुर (बुद्द) + ने सर्भा को मोक्षमाग दिखाकर जगत्‌ का '्वस करने का उपक्रम किया था तब देवताओं ने आकर छल किया तथा उसे सदा के ढिए शान्त कर दिया । सच बात तो यह हे कि देश की दुगति, जिसकी चचा हम यत्र तत्र सुनते रहते हैं उसका कारण इसी घर का अभाव हे । यदि देश के सभी लोग मोक्ष-घम का अनुसीलन करने ठग तत्र तो बहुत ही भच्छा हो, परन्तु वह तो होता नहीं, भोग न होने से त्याग नहीं होता, पहले भोग कीजिये, तब त्याग होगा । नहीं तो देर के सब लोग साघु हो गये, न इघर के रहे, और न उधर के । जिस समय बौद्ध राज्य में एक एक मठ में एक एक लाख साघु हो गये थे, उस समय देश ठीक नाश द्ोन की ओर अग्रसर हुआ था । बाद, इसाइ, मुसलमान, जन सभी का यह बम्म्मथवणाणण + गयासुर और वुद्धदेव के अभिन्नत्व के सम्बन्ध में स्वामीजी का विचार बाद में परिवातित दो गया था । उन्होंने देदत्याग के थोड़े दिन पूरे काशीजी से अपने एक शिष्य को जो पत्र लिख भेजा था, उसमें एक स्थान पर यह लिखा था--- र्निपुराण में गयासुर का जो उलख है, उसमें ( जैसा डॉक्टर राजिन्द्रलाल मित्र का मत है ) वुद्धदेव की और लक्ष्य नहीं किया गया हें । वह पृव स प्रचलित सिफ एक किस्सा मात्र दे । बुद्ध जिस गयाशीष पवत पर वास करने गये थे, उससे यह स्थान पूव था ऐसा प्रमाणित हुआ हैं ।” ( उद्बोघन, अष्टम वर्ष, प्रष्ठ ५८८ )




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