बृहद्यवनजातकम | Brihadyvanajatakam

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Brihadyvanajatakam  by पं ज्वालाप्रसाद मिश्र - Pn. Jvalaprsad Mishr

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(८) बूृदहयवनजात कर भू ।छयेश छठे स्थानमें हो तो उसके शद्ट हों, आयुवान्‌ हो, पुत्र और मामाकों सु हो, पशु और मातासे सुख हो! अनेक नाते युक्त- मवुष्य कृपण होता हू ॥ ६ ॥। प्रथमठशपतिमेतुजः छ्ियं सुवभनेर शुभशीलविठातितमू । सविगय वनितोपतुव च हि सरुठरुपपुर्त कुरुते सदा ॥ ७ ॥ लग्रेश सप्तम हो तो मवुष्य खी घनका सुख पावे, अच्छे शीर और विछाससे युक्त, विनयवान्‌, सकझ रुपवान्‌ करता है ॥ ७ ॥ . प्रथमभावपतिमूंतिगों मर्ति विद्धते छपणं घनवखकमू । विविषकथ्टयुत शुभदष्टिवी भवाति मानव हु४ छतवाद सुवीर # ८ ॥ जा ठप्ेश अशा हो तो सूत्यु हो वह मवुष्य कृपण और धन- बैचक हो, तथा अनेक कट हों ओर अच्छे श्रहयोकी दृष्टि हो तो मान बडाई युक्त बुद्धिाव्‌ होता है ॥ ८ ॥ तढुपसतिठुते तप युवे सइजमित्रवशन्पतिदेशकद । सुखसुशीलगिरिक यशो निधि तति दूज्यतमों मु जो चू गा सू ॥९॥ ह जो छप्रेश नवम हो तो तपती; भाई मित्रति युक्त, प्रवासी, सुख शीलका स्थान, यशस्री, राजोंपें पूज्य, मतुष्योंमें प्र ते डे होता है॥९॥ दशमघामगते तवुताय के जनरमातृजुवं चूपतेः समा । सकढभोगतुव शुभकरगां कविषर युहुदूजनकं वरमू ॥ १० ॥ जो छुपे दृशम बाएं हो तो माता ओर पिताका सुख हो राजाकी समान हो, सम्पूर्ण जोगोंका उु हो तथा शुमकर्माका कतों ओर गुरुपूजन करनेवाछा होहा है ? १० ॥!का गयद ७ दि के प्‌ ० न छः कि यू दही ठ । । च्ू शा ञ््श छू गो गे दो दीन: सनकन्वक बन्व्यूफ छह कि गे | ) मसट बन ज यूरगर लक वभग रण श ध डे वन अगुनत जुरुतु व शुवभावुनुम|ज्दप् !दरहिशु कि स्ड $. छषद, भगन फनी ,मि फ०,. थे शव कशुनशात्व व ! बिक तू ी न दबाए गजर १रशिनुर्ुव राविरकाववुदकाइवू ता 1: प1४




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