शरणागति रहस्य | Sharanagati Rahasya

Sharanagatirahasya by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चिमीषणका दारण आाना न महर्षि कहते हैं 'आजगाम” । पआजगाम” के साथ कहा है. 'मुहूर्तेन” । क्या विभीषण उ्योतिषियोंपि मुहूर्त झोधन करवाकर चले थे ९ नहीं नहीं । इसका अर्थ है, मुहर्तमात्रमे; जल्दीसे । इसके द्वारा भगवदूभक्त विभीषण- की मानसिक अवस्थाका सूचन किया है । बह चिरकालसे भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रके दर्शनके छिये उत्सुक हो रहे थे । उनको बड़ी उतावठी लग रही थी कि कब लक्कासे छुटकारा पाऊँ और भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन कहूँ । वह जब दुबारा रावणकों समझाने उसके महठम गये थे तो भीतर-ददी-भीतर यह भी घुकड़-पुकइ लग रही थी कि अर यदि समझानेमे लक्कापति रास्तेपर आ गये तो श्रीरामचन्द्र चरण-दरशन नहीं हो सकेगा । खैर, ज्येष्ठ श्राताका तो कन्याण होगा । मैं मनके द्वारा तो चरणोंकी शरणागति स्वीकार कर ही चुका हूँ । फिर और कोई उचित अवसर देखकर झरणमें चला जाऊँगा । किन्तु जब रावणने उचित सलाहकों ठुकरा दिया और विभीषणका घोर अपमान किया, उस समय उन्हें ला छोइना निश्चित करना पढ़ा । अब उन्हें भगवच्छरणमें जानेके बीचका विलम्ब कैसे सहन होता * जैसे ही प्रात:काल हुआ कि वछड़ा देखता रहता है कि क्र दोहनेका समय आवे और मैं माताके पास पढुँचूँ और स्तन- पान कहूँ । जैसे ही गौको चरनेके लिये छोड़नेका समय आया और दुहदनेवाला दुद्दाली ( दोहनी ) लेकर पास आने ठगा कि. बच्छा अपने खूँटेसे बैँँधा ही खुलनेके लिये तड़फड़ाने ठगता है । रस्सीको खूँटेसे खोलते समय तो वह यहाँतक




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