प्राचीन भारतीय साहित्य में नारी | Prachin Bharatiy Sahity Men Nari

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Prachin Bharatiy Sahity Men Nari by गजानन शर्मा - Gajanan Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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{ ११ 3 यस्तु की बाह्य स्मभीयता मानव की आन्तरिकं रमणीयता का अक करती है।* नारी रूप के लिये भी यह पूर्णतया चरिताथे होता है । नारी-सौन्दयं के प्रभाव ने अनेक दुसचारियों में पूनीति, शुरचि और संस्कृति का संचार कर दिया है । * ५ । सौम्यं साहित्य का राण है--सदय गौर्‌ नीति के साथ शिवत्व का योग जिस संपूर्ण सौन्दर्य की सृष्टि कराता है, वहू अमुपम रूप से हुदय-हारी होता है । ह्ुस्यातुरंजन काव्य का प्रधान गुण हैं, अत: कांस्य भथवा साहित्य की प्राण सौन्दर्य हो है । सीन्दये के साथ ही ओआनत्द श्र लगावस्था अनिवायें रूप से सम्बद्ध हैं, अत: सौ्दर्य-चिनण से ही काव्य का ब्रहानन्द सहोदरदंव निष्पल हो जाता है, भर उसी थे सना साधारणोकरण भी प्रस्फुट हो जाता है, म्योंकि सौन्दर्य-बोध समस्त मातवन्वेतना में एक-सा है । सौन्दयं-नोघ से जिस परम सत्म की उपलब्धि होती है, बहू सभी मानदातह्माओं को 'सावसु्ि की एकता पर पहुँचा देता है । सौन्दर्य ही मिश्चपैन मानवता और संस्कृप्ति का उद्भावक है, सीन्दर्य-चिष्ठा से ही मव-मातव संस्कृत होकर नव-नागव के रूप में विकसित होता है ।* सुन्दर बा है--भतः प्रत्येक साहित्यिक का यह नातेव्य हो जाता है कि बह सुन्दर के रूप से भलीन्भाँति अवगत हो 1 सौन्दर्य को विश्वदसूप से समाने के लिये सौत्दर्य-शास्त्र क्षे खनक मनीषि तै प्रथल कयि हैं, जिनमें कुछ परस्पर विरोधी भी हैं । फिर थी हम उनकी समन्वयात्मक संधि रुप-रेवा इस प्रकार उपस्थित कर. सकते हैं । रूप, भोग मौर अभिव्यक्ति के सामंजस्य से सौन्दर्य की प्रतीति होती दै? जो वस्तु २. सुभिननानन्दन पन्‍्त :--- कहौ खोजरि जाते हो, सुन्दरता औ” नन्द अपार ? इस मांतिलता में हैं भूततित, अखिल भावनाओं का पार) मांस-पुक्ति है भाव-मु्ति, आ' भाव-मुक्ति जीवन-उल्लास हर माघ मुक्ति ही लोक-मुश्ति, भव-जीवन का जी चरम विकासि 1 मासो का दै मोस मातुपी, माक्ष करो इसका सम्मान ४ निभित करो मीस का जीवन, जौवन-पस कसो निर्माण । --लीकन-मोस--युणवाणी, २. रम्य सृष्टि हो स्प जपत्‌ की, रम्य धरः श्ृद्धार , बाह्य रूप हो सम्यव्स्तु का, हौगे रम्थ विचार । का रूप निर्माण ; बुगवाणी, सुन्दर ही पावन, संस्कृत हौ वावत सिस्य ॥ सुम्दर हो भू का मुख, संस्कृत जीवन-संचय ! सुम्दर हो भव-मालय, संस्कृद जड़-वेतन-समुदय, झुन्दर नव-मानिव, संस्कृत भव-मानव की जय ! पेखिए---सूत जगत्‌--'युगवाणी' {




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