भक्त - पञ्चरत्न | Bhakt - Pancharatn

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Bhakt - Pancharatn  by हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

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He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सघुनाथ भगवान्‌की शरण होकर व्रह कहने ठगा-श्रमो | अव तुम्हारे सिवा मुझे इस विपत्तिसे कौन बचा सकता है ? हे चक्रपाणि ! हे मनोरथ-कल्पद्ुम | हे कृपाके सागर । हे विपत्तितमका नास करनेवाछे सुय ! आज सर्तीके मनःसन्तापका नाद करनेके लिये कोई उपाय कीजिये । हे सर्वान्तर्यामिन्‌ ! तुमसे कुछ भी छिपा नी है, तुम्हारे सिवा इस समय दूसरा कोई रक्षक नदीं है इसप्रकार व्याकु ओर आर्तं होकर रघुनाथने न माद्धम मगवानूके सामने कितनी बातें कहीं । रात अधिक हो गयी थी, व्यथितः चित्तसे स्तुति करता हुआ वह सिंहद्रारके पास ही टाटके फटे चिथडेपर सो गया । रारणागतवत्सङ भगवानका चिन्तन करते-करते ही निद्रा-देवीने उसे धेर छिया। जो अपनेको निर्बल समझकर भगवान्‌को आर्तमावसे पुकारता है, भगवान्‌ उसकी तत्का सुनते है । आज जगन्नाथ अपने भक्तकी व्यथासे व्यथित हो गये । उसी क्षण भगवान्‌की मायासे रघु उसी निद्रित अवस्थामे करावतीपुर गंगाधर करणके द्रवाजेपर पच गया | आजकल रोग कहते हैँ कि यह सव बरत निरी कल्पना है । इसभ्रकारकी अप्राकृत षटनार्प कमी नहीं हो सकतीं, अतएक . ये सब अविश्वसनीय हैँ । परन्तु वे भूते हैँ । भगवान्‌ ओर उनके सचे भक्तोकी बतं तो अरोकिक होनी ही चाहिये { क्योंकि भगवान्‌ प्रकृतिसे अतीत है, जैसे उनका निराकारसे [६




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