प्रवचन डायरी भाग १ | Pravchan Dayeri (vol-i)

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Book Image : प्रवचन डायरी भाग १  - Pravchan Dayeri (vol-i)
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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9 : सर्यादा महोत्सव ‰की न सुनी ओर इसे चालू कर दिया । इस महोत्सव जैसी सजीवता कभी नहीं मिलती | जो कभी नहीं आते वे भी इस अवसर पर तो आ ही जाते हैं । दूर-दूर से मारवाड, मेवाड़, बगाल, शुजरात, वम्बई उत्तर प्रदेश से ही नहीं जर्मनी तक के लोग यहाँ उपस्थित हैं ।यह २००६ का माघ-महोत्सव सरदारशहर मे मनाया जा रहा है} इसमे १४० साघु ओर ३६३ साध्वियाँ सम्मिलित हैं, चारो ही तीर्थ में ठाठ लग रहे हैं ।यह तो मैंने विधान के बारे में वताया । अब साधु-साध्वियो को. सम्बोधन करके इन्हे भी दो शब्द कहना है ।समस्त साधु ओर साध्वियों को वही रोजाना की शिक्षा है। मूल लक्ष्य को मत भूलो । पहला लक्ष्य है आचार में दृढ़ रहना थर दूसरा लक्ष्य हे विचार व्यक्त करना | आचारहीन विचारों मे क्रान्ति कोई काम की नहीं । मूल लक्ष्य पर बद्ध होकर चलो । जानते हो अव विदाई होनेवाली है; मेरी भी विदाई होने वाली है। मे साथ भी नहीं गा, फिर भी स्टूँगा साथ में। हर एल सयम में जागरूक रहो । स्वार्थी मत, वनो] जो ल्लौग कल्याण का मार्ग चाहते हैं उन्हे रास्ता दिखाओं । निर्मय होकर व्यक्ति-व्यक्ति में धर्म का प्रसार करो । चाहे इसके लिये कुछ मी कुर्बान क्यो न करना पडे |अव श्रावको को कुछ कहना है | श्रावक-श्राविका भी सचेष्ट ओर जागरूक रहै | में उनकी ऐसी हरकते नहीं सुनना चाहता कि वे जीवन को न उठाकर थोथी नुक्ताचीनी मे समय चिताये | उन्हे आतमालोचना म समय लगाना चाहिये ।मुे कभी-कभी रेषा सुनने म आता है कि तेरापन्थे का संगठन अव क्या चलेगा; बहुत चला । जैसा कि समय-समय पर पहले भी सुना जाता रहा है। मैं उन्हे स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि यह भगवान महावीर का पथ है, त्यागियो की जमात का पंथ है । इसके प्रति यदि वे ऐसा स्वप्न देखते हैं तो वह स्वप्न होगा । सगठन था; है और रहेगा | इस सघ की नींव आचार पर टिकी हुईं है ।सभी श्रावक जीवन वदले और जीवन को उठाने के कार्य में सहयोगी वें ।मैं फिर संघ चतुष्टय से आह्वान करूँगा कि सब आत्म-कल्याण के लिये टूट पड़े | । ससार अशान्त है, यह कोई नई वात नहीं है। परिस्थिति क्लान्त है यह कोईनई बात नहीं। ससार शान्ति की ओर आंखे फाड़े निहार रहा ३, यदह भी कोई नई बातनहीं । पर शान्ति मिले कैसे ४ उसे पाने का कया रास्ता है किस मागं से हम उसे पा सकते हैं, यह देखना दै । भौतिक सुख-सुविधाओ और भोग-विलासी से शान्ति की आशा रखना तौ ठीक वैसा ही है जैसा कि एक व्यक्ति गाय-मैंस इसलिये न रखे,




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