समाज शास्त्रीय अनुसंधान का तर्क और विधियाँ | Samaj Shastriy Anusandhan Ka Tark Aur Vidhiyan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वंज्ञानिक प्रसाली के झाघारमूत सिद्धास्त 236 वैज्ञानिकों द्वारा प्रयुक्त अवघारणाएँ सामान्यत जटिल श्रथवा कठिन होती हैं । उनका प्रयोग भी विशेष म्र्थ व परिस्थिति में क्या जाता है 17. श्रवधारणाश्रो का विकास होना रहता है तया उनमे परिवतेन भी होता रहता दै । वे प्रपनी प्रकृति, विशेषनाएँ श्रथवा अध्ययन केन्द्र बिन्दु समय-समृय पर यदल भी सकती है 18 अव्रधान्णाका उदेश्य यथार्थं (एत्व) को समभने एव उसे स्पष्ट करने में समाज वैज्ञानिकों की सहायना करना होता है 19 जब प्रवघारणाओों को निरीक्षण की इकाइयों तथा उनकी विशेषत्ताधो के श्राधार पर वर्मीकृत करने हेतु प्रयोग में लाने हैं तो उसे हम चर ( ४४118916 ) कहते है । चर भ्रवधारणा को माध्य विमिति है । उदाहरणाय दुर्वीम के सामाजिक विघटन के सिद्धान्त में मानव जनसख्या को समानता, एकता व विचलन के विरोध के झाघारों पर वर्गीकृत क्या गया है ।10 श्रववारणाणं उप्रकल्पना (प१0०116515) निर्मारा मे सहयोगी होती है! ष्टी बी बौटामोर'के अनुमार नई प्रवधारणा दो उद्यो की पूति मे सहायक होनी है । प्रथम श्रव तक पृथर्‌ पृथक्‌ रूप में प्रकट न होने वाली घटनाओं के वर्गों को ये वर्मीकृत श्रथवा विभाजित करते हैं, तथा द्वितीय, वे घटनाश्रो के सक्षिध्त वर्णन व प्रागे के विश्लेषण मे सहायक होती हैं ।11 म्रवघारणाएँ सिद्धान (षच्ण+) के श्रनिवायं श्रम होनी है, क्योकि प्रयुक्त श्रववारणाग्रो के श्रघार पर टी 'सिद्धान-निर्माण” की नीव रखी जानीहै।12 एक अवधारणा न तो सत्य होती है न भ्रसत्य, क्योकि बहु तो केवल मात्र एस्द्रिय तथ्यों (52055 318} का नामोलेख या सकतीकरणा ही होता है। यह मानव इन्द्रियों को प्रभावित करने वाले अथवा उनमे अपना प्रतिबिम्ब या सवेदन उत्पन्न करने वाले तथ्यों का एक भमूर्त रूप ही होता है ।13 श्रदधारणाएं मापनात्मक' हीनो चाहिए । प्रदधारणाश्नो को मापना उसकी श्रमूर्तता पर निर्नर करता है, वह जितनी कम श्रूतं होगौ उत्तनी ही सरलता से उसे मापा जा सकेगा ।14 पव्घारगणाो की ्रस्पप्ट्ताग्नो को, दूर. कसले वे एन्‌ उन्हें, सील: सर; से परिभाषित क्या जाना चाहिए तथा उनका 'मानकीकरण' (51807ं810(28- (00) किया जाना चाहिए 115. मिचेल (वा1९ ) ने डिक्शनरी झाफ सोश्योलोजी' में अवधारणाम्ो के लिए तीन कसीटियों का उल्लेख किया है* वे हैं--1 टन्छकछर वद क्र्छ्वन्छ 0 ता, 43 2 © ०००८० पव ० ल, ४३




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