अनेकांत | Anekant

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Anekant by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चर्प २ किरण १] गा उपरम्भा | १७ वह सव-कुछ कर सकता है । उसकी शक्ति सामथ्यं सुदूर-सीमावर्तिनी है, ? मनके सधर्षको दबयि, वह्‌ स्वामिनीकी तरफ देखती-भर रही । इस आशासे कि वे कुछ स्ट कहे। श्र तसी-- स्वामिनीकें युगल-अधरोंमे स्पन्दन हुआ। शुभ्न-दन्त-पंक्तिको सीमिंत-कारावासके बाहर कया है {-- यह देखनेकी इजाज़त मिली, अरुण, कोमल कपोलोपर लालिमाकी एक रेखा सची । पश्वात्‌-नव-परिणीता-पत्नीकी सोति सलज- चाणी प्रस्फुटित हुई !-- 'तू मेरी प्यारी सहेली है , तुमसे मेरा क्या छिपा है । कुछ छिपाया भी तो नहीं जासकता | मेदकी शुप्त-वात तुमसे न कहूँ तो, कहूँ फिर किससे . ./--सखीको छोड़, ऐसा फिर कौन ? .. मेरे दुख-सुखकी वात... «.. --रानी सा्िवा- ने वातकरो अधूरा ही रहने दिया । बात कुछ वन ही न पढ़ी इसलिये, या देखें सखीका क्या आइडिया है-अभिमत दै, यद जाननेके लिए । सखीको महदारानीसे कुछ प्रेम था, सिफे वेतन या दासित्व तक की ही मर्यादा न थीं । ` समस्या. का कुछ आभास मिलते ही उसने अपने हृदय उद्गारोंको बाहर निकाला--झाप ठीक कहरही हैं, महारानी, कोई मी वात आपको मुभसे न छिपाना चाहिये । और मैं शक्ति-साध्य कार्य भी यदि आपके लिये सम्पन्न नकर सकी तो- मेरा जीवन धिक्कार। छाप विश्वास कीजिए मसे कदी हुई वात श्रापके लिये सुखप्रद हो सकती है । दुखकर कपि नहीं । आपकी अमिलाषाकों मुक्त तक आना चाहिये, बगैर संकोच, मिमकके ! इसके वाद्‌ उसे पूर्णताका रूप देना-मेरा काम | में उसे प्राणो की वाजी लगाकर भी पूरा करनेकी चेष्ठा करेगी !' ८ ` लेकिन सखी। बात इतनी घृणित है, इतनी पाप-पूर्ण है, जो मुंहसे निकाले नहीं निकलती । मैं ज्ञानती हूँ-ऐसा प्रस्ताव मुमे मुँहपर भी न लाना चादिए । मगर लाचारी ह, हृदय समाये नहीं सममता । एक दसा नशा सवार है, जो--या तो मिलन युः प्राण.विसज॑न-पर तुना बैठा हे । मै उसे दरकरा नदीं सकती । कलंक लग जायेगा, इसका मुभे मय नदीं । लोग क्या कहेंगे, इसकी मुमे चिन्ता नही । मै तो वस, अपने हदयके ईश्वरको चाहतीहूँ । ' ` - मदारानीके विन्हल- करठते प्रगट किया । शायद शरीर मी कृच प्रगट होता, फि विचित्रमालाने वीच ही मे रोका- परन्तु वह ईश्वर हे कौन ! ' “लंकेश्वर-महाराज-रावण ”--छधमुँदी-अखो- में स्वगं-सुखका आाव्दान करती-सी, महारानी कहने लगी--शायद्‌ तू नहीं जानती मैं उस पुरुषो- त्तमपर, छाजसे नहीं विवाहित होनेके पू्वसे ही; प्रेम रखती हूँ, मोहित हूँ । तभीसे उसके शुणोंकी, रूपकी, चौर बीरताकी, हदयमे पूजा करती घा रही हूँ । लेकिन कोई उचित, उपयुक्त अवसर न मिलनेसे चुप थी, परन्तु-अव भ्राज बह शुम दिवस सामने है, जव यै उसतकं अपनी इच्छा पहुँचा सक । उसके दशंनकर, चरणोमे स्थान पाकर, अपनी अन्तराम्नि शन्त कर सक्‌ ॥ वह आज समीप ही पारे हे । हमारे देशपर विजयः पताका फदराना उनका ध्येय है। * काश ! उन्हें मालूम दोता कि देशकी महारानीकें हृद्यपर वह कबसे शासंन कर रहे-हैं ' - -




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