भारतीय संगीता का इतिहास | Bhartiya Samgita Ka Itihaas

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Bhartiya Samgita Ka Itihaas by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ ............... भारतीय संगीत का इतिहास विशुद्ध सरल अर्थात्‌ (राईट म्यूजिक' के नाम से व्यवहृत है, जो सदेव 'कामचार- प्रवर्तितः हुषा करता है द्विलं च तत्तहेशमनुजमनोरंजनैकफरस्वेन कामचारघ्रव तितम्‌ ही संमीतकला का प्रवाह सदेव दो धाराओंसे प्रवहित होता रहा हर सांग तथा २. देशी । प्रथम में शास्त्र के अनुगमन के द्वारा कला की परिप्कृतता तथा अभिजातता पर ध्यान दिया जाता है, दूसरे मे लोकाभिरुचि नियामक तत्व | होता है तथा शाश्रपक्ष गौणं होता है । प्रथम के छिए विशिष्ट संस्कार एवं ` रिक्षा-दीक्षा कौ आवश्यकता होती है, दूसरी सम्पक तथा सहज संस्कारों मे प्रसूत होकर सवंजनबोध्य होती दै) दोनों में कढाकार की सौन्दर्यानुभूति क। विशिष्ट स्थान रहता है, केवल अन्तर यह है कि “मार्ग' में वहुंनियमों की सीमा में आवद्ध रहती है तथा 'देशी' में उसकी अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत स्वच्छ्द रूप स होती ह्‌ ध्यान मे रखना आवश्यक है कि माग॑ तथा देशी दोनों परस्पर साप्त संज्ञाएँ हैं । प्रत्येक कला. जनजीवन से सम्बद्ध होने के कारण उसका दशी निविवाद है । कांछक्रम से जब उसका अपना व्याकरण बन जाता है, वहीं कला मार्ग' कहलाती है । साम तथा गान्धवं दोनों का मुलाधार जोकसंगीत रहा है और इस दृष्टिकोण से दोनों मूलतः देशी संगीत का प्रतिनिधित्व करते हैं । संस्कार एवं परिष्कार से संयुक्त होने पर इसी का अन्तर्भव मार्गमे किया जाता रह ~दह) सामवेद भारतीय संगीतकला का प्राचीनतम निदर्शन है । इसका स्रोत तत्कालीन लोकसंगीत ही रहा है तथापि यज्ञयाग जैसे धार्मिक समारोहों से तथा समाज के उच्च वगं से सम्बद्ध होने के कारण उसमें संस्कार तथा नियमबद्धता की मात्रा बढ़ गई और उसे शिष्ठसम्मत मार्ग संगीत का स्वरूप प्राप्त हुआ । इसके अतिरिक्त लौकिंक समारोहों पर गीत, वाद्य तथा नृत्य का आयोजन बराबर किया जाता रहा ।. यह संगीत 'देशी संगीत' रहा हो, ऐसी यथाथ कल्पना की - जा सकती है । रामायण में लवकुश के द्वारा श्रीरामचन्द्र के समक्ष मार्य प्रणाली . से गान किए जाने का उल्लेख है।* यद्यपि मार्ग तथा. देशी का स्पष्ट विभेद रामायणकालू में निरूपित नहीं, तथापि “मांग से तात्पर्य शिष्जनसम्मत प्रणाली . से रहा हो ऐसा प्रबल अनुमान किया जा सकता है। संगीत का उद्गम :-- ` दर पुराविदो के अनुसार संगीतकला तथा शार का उद्धूव स्वयम्भू परमेदवर से हुआ है । भारतीय परम्परा के अनुसार नटराज शिव नृत्यकछा के आदि स्रोत नः 11 कि १ - डर संगीवरत्नाकर पर था कल्लिनाथ व्याख्या । २. विस्तार के लिये द्र० इसी प्रबन्ध का अ० ३-'महाकाव्यकाल में संगीत' ।




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