अप्तमिमंशा प्रवचन (भाग -८ ) | Aptamimansha Pravachan (bhag - Viii)

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Aptamimansha Pravachan (bhag - Viii) by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ष्टम भाग (भ्रवशिष्ट) {१७ परार्थका प्रत् भिन्न न करनेके लिए समर्थ हो जायया | तब सर्वथा क्षणिक भी रहा झ्राया श्रौर प्रत्यभिज्ञान भी बन गया । इस शकाके उत्तरमें कहते हैं कि पूर्वक्षण होने वाला प्रमाता भ्र्थात कारणरूपसे माना गया पूर्व जीव गौर उत्तर क्षणमे उत्पन्न हुमा प्रमण्ता श्रर्थात कार्यरूपसे माना गया वह जीव इन दोनोमें जो कार्य-कारण भावरूप सम्बन्ध विशेषकी कल्पना कर भी लो तो भी जैसे पिताके दारा देखे गए पदार्थको पुत्र प्रत्यभिज्ञानसे जोन नहीं सकता इसी प्रकार र'स कारण कार्यकी सनतिमे भी एक दूरम प्रत्यन्त भिक प्रन्वयरहित दूमरा जीव पिते जीवके हारा देखे गए पदार्थकों प्ररछभिज्ञान प्रमाणम जान नही सकता है । शकाकार कहता है कि देखिये ! पूवक्षण मे जौर उत्तरक्षण्मे कार्यकारण पतम्बन्ध होनेपर भी कँसे नही उत्तर जीव पूर्वं जीवके देखे गणकों नहीं जान कना ? जव उसमे उ्ादान उपादेय सम्बन्व विशेष है तो उत्तर क्षणमे उत्पन्न हुझा जीव उत्तर चित्तक्षण पूवं चिनत्तक्षणके द्वारा जनि गए पदां को प्रत्यभिज्ञानसे जानतेमे समय हो जायगा । इसके सम।घानमे कहते हैं कि उन पूर्व त्तर क्षणोमे उपादान उपादेयलूप प्रतिश्य विशेष भी मान लो 1 लेकिन यहे सम्बन्ध भी एथबत्वका निराकरण लो नहीं कर सकता । भर्थात्‌ पूर्वक्षण उत्तरक्षणमे होते जाने राले ॐव एक दुसरेसे सवधा भिन्न है, यह गत तो नही मेट सकते । श्रौर जद पूर्वक्षण उत्तरक्षण सवंधा भिन्न ही रहे तब एकत्वका ज्ञान वहाँ बन नहीं सकता | पूर्वक्षण श्रौर उत्तरक्षणक! प्रथक्त्व माननेपर भर्थात्‌ पूर्वपर्याय स्वतन्त्र एक द्रव्य है उत्तरपर्षा। श्यतन्त्र एक द्रस्य हे । इप तरह पूर्व शरीर उत्तरक्षणकों बिल्कुल भिन्न माननेपर प्रत्यभिज्ञान नहीं बन सकता है । इस ही बातकों दिखा रहे हैं । देखिये ! जो पृककत्व यहाँ पूर्वलण भ्रौर उत्तरक्षणामे है वही प्रयवत्व पिता पुष्मे है । तो जैसे पिता पृष्र जब भिन्न भिन्न हैं प्ौर वहाँ यह वात घटित होती है कि पिताके द्वारा देखे गण पदार्थको पृतर प्रत्यभिज्ञानसे नी जान पकता । इसी प्रकार ॒पूववित्तभणके देखे गए पदार्धेका उत्त रचित्तक्षण प्रत्यभिज्ञान नहीं कर सकता । तो पिता पुत्रकी भाँति प्रत्वभिज्ञानके श्रभावका कारण भूत प्रयक्टव इस पूर्वक्षण भ्रौर उत्तरक्षणमे है ही । सभी जगह उस पृथक्त्वको म्रविधेषता है । पिता धौर पुत्र जैसे ये वोचो भिन्न-भिन्न है इसी प्रकार क्षणिकवादमे जिमने भो चित्तक्षण (जीव) सतानमे उत्पन्न हो रहे हैं वे सित्तक्षणा भी भिन्न-सिन्न है। संतान कुछ नही है. किंतु समभनेके लिये बताया जा रहा है कि एक ही शरीरमे जैसे प्रनेक जीव उत्पन्न होते है तो उनकी परस्पर विभि. न्नता है भौर तब वे सारे जीव भिर्न-भिन्‍न ही हैं । तो एकके जाने हुए पदार्थका दूष रा! श्रदयभिक्षान नही कर सक्ता । निरन्वयवादमे भिन्नचित्तक्षणोमे प्रत्यभिन्नानकी श्रसभवता-यदि शङ्का कार यह्‌ कहे कि एक सठानमे पड़े हुए चित्तक्षणोमे प्रत्यभिज्ञान वन जायया, नाना संतानोमे पड़े हुए चिश्रझमग्गोगे प्रत्यभिज्ञान ने बनेगा । यद्यपि स्व सतति पतित व




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