श्री भागवत दर्शन [ खण्ड-२४] | Shri Bhagwat Darshan [ Khand - 24 ]
श्रेणी : साहित्य / Literature
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
213
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)त्याग तथा परोपकार १५पूज्यपाद उद्या बाया ते मुझे, एक कहानी सुनाई धी ।
ऋछपीकेश मे एक वड सिद्ध महत्मा रते थे! धड़ दिद्टान् थे ।
नम रहते थे, कभो किसो से कोई शब्द बोलते नहीं थे, सदा
मौनी वने रहते । झपने हाथ से खाते भी नहीं थे। दूसरे लोग
उन्दः खिलाते ये । सव लोग उन्हें ज्ञान की, छठी भूमिका में स्थित
चताते थे । एक दिन सुना उस महात्मा को कोई चुरा ले गया ।
चहु महात्मानो ने द् की उनका कदी पता नहीं ला । लोगों
ने सममा उद्दोने जल समाधि से ली। कई वर्षों के पश्चात,
पता लगा दे घस्वई में अमुक सेठ के यहाँ हैं। लोगों ने दर्शन
भी किये । सेठ यड़े धर्मास्मा थे उनकी ख्रो भी बड़ी साघुसेवी
भक्तिमती तथा साध्वी थीं। महात्मानी 'अच भी नंगे दी रहते
थे । उनका सौन भी उसी प्रकार चलता था । सेठजी की कोठी के
सव से ऊपर के सुन्दर कमरे में वे झफेले हो रद्दते थे । सेठानी
की उनपर छनन्य श्रद्धा थी । वे तन मन धन से उनकी सवा
करतीं ।यह सेवा ऐसी वस्तु है, कि पत्थर का हृदय भी पसीज
जाता है संसार में बल, युद्धि, साहस, श्रम तथा अन्य फिसी
भी साधन से जो कार्य न हो सके, वह सेवा से दो सकता है।
मदात्मा का भी चित्त खिंचने लगा । संयोग की बात, सेठजी एक
छोटा सा बच्चा छोड़ कर इस लोक से चल बसे । फिर भी
सेठानीकी श्रद्धा में कुछ फमी नहीं हुई। अब तो मददात्मा के
हृदय में करुणा का स्रोत उमइने लगा । रथ थे लियफर थे
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