तीर्थकर महावीर और उनकी आचार्य -परम्परा | 5085

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5085 by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कृष्णा अमावस्या, वीर-निर्वाण संवत्‌ २५०२, दिनाडु १३ नवम्बर १९७५ तक पूरे एक वषं मनायी जावेगी । यहु मङ्गल-प्रसङ्ख भी उक्त ग्रन्थ-निर्माणके लिए उत्प्रेरक रहा । अतः अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्रत्परिषद्ने पाच वषं पुवं इस महान्‌ दृरभ अवसरपर तीर्थकर महावीर ओर उनके दर्शनसे सम्बन्धित्त विशाल एवं तथ्यपुणं ग्रन्थके निर्माण मौर प्रकाशसका निश्चय तथा संकल्प किया । परिषदने इसके हेतु अनेक बेठकं कीं ओर उनमें प्रन्थकी रूपरेखापर गम्भीरतासे उहापोह किया । फलतः ग्रन्थका नाम 'तीथंङ्कर महाबीर ओर उनकी आचायं- परम्परा निर्णीत हुभा भौर लेखनका दायित्व विद्वत्परिषदुके तत्कालीन अध्यक्ष, अनेक ग्रन्थोंके लेखक, मूर्घन्य-मनीषी, आचायं नेमिचन्द्र शास्त्री आरा (बिहार) ते सहषं स्वीकार किया । आचायं शास्त्रीने पाँच वषं लगातार कठोर परिश्रम, अदधत खगन ओौर असाधारण अध्यवसायसे उसे चार खण्डो तथा लगभग २००० (दो हजार) पृष्ठोमे सुजित करके ३० सितम्बर १९७२ को विद्रत्परिषदको प्रकाश- नाथं दे दिया | विचार हुआ कि समग्र ग्रन्थका एक बार वाचन कर लिया जाय । आचायं शास्त्री स्याद्वाद महाविद्यालयकी प्रबन्धकारिणीको बेठकमें सम्मिलित होनेके लिए ३० सितम्बर १९७३ को वाराणसी पघारे थे । ओर अपने साथ उक्त ग्रन्थके चारों खण्ड लेते आये थे । अतः १ अक्तूवर १९७३ से १५ अक्तूबर १९७२ तक १५ दिन वाराणसीमें ही प्रत्तिदिन प्रायः तीन समय त्तीन-तीन घण्टे ग्रन्थका वाचन हुआ । वाचनमें आचायं शास्त्रीके भत्तिरिक्त सिद्धान्ताचायं श्दधेय पण्डित केकाशचन्द्रजी शास्त्री पूवं प्रधानाचायं स्याद्वाद महाविद्यालय वाराणसी, डॉक्टर ज्योतिप्रसादजी लखनऊ भौर हम सम्मिलित रहते थे । आचाय शास्त्री स्वयं वाचते थे और हमलोग सुनते थे । यथावसर आवश्यकता पड़ने पर सुझाव भी दे दिये जाते थे । यह वाचन १५ अक्तूबर १९७३ को समाप्त हुआ और १६ अक्तूबर १९७३ को ग्रन्थका पहला भाग 'तीथेंडूर महावीर और उनको देशना' ' प्रकाशनाथं महावीर प्रेसको दे दिया गया, जो लगभग ९ माहमें छपकर तेयार हो सका । ग्रन्य-परिचय इस विज्ञाल एवं असामान्य ग्रन्थका यहाँ संक्षेपमे परिचय दिया जाता है, जिससे ग्रन्थ कितना महत्त्वपूर्ण है और लेखकने उसके साथ कितना अमेय परि- श्रम किया है, यह सहजमें ज्ञात हो सकेगा । इस ग्रन्थके चार खण्ड हूं--१. तीथंड्ूर महावीर और उनकी देशना, १४ : तीर्थकर महावीर जौर उनकी आचार्य-परम्परा




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