विवेकानन्दजी के संग में | Vivekanand Ji Ke Sang Men

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Vivekanand Ji Ke Sang Men by शरचन्द्र चक्रवर्ती - Sharachandra Chakravarti

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रहे है--अह्ान छा आदि व अन्त--इस विषय में शास्प्रीक्ति-ण अश्ान प्रवाद के रूप में नित्य जैसा लगता है, परम्तु उसका अस्त होता है--समस्त म्रग्याण्ड श्रप्न में अप्वरत दो रद दै-- जिस पदले कमौ नदरी देखा, उसे$ सम्बन्ध मे भष्वात होता ह या नदी-- अद्मतत्व का स्वाद गूंगे के स्वाद जैता है ( मूडास्वादनवह्‌ } । २१. द्वितीय खण्ड काल-१८९८ से १९०२ ईस्वी । परिच्छेद २३ . स्थान--चेठू मठ ( निर्माण के समय ) । वर्-१८९८ ईस्वी । विधय--मारत की उच्नति का उपाय क्या है १--दुसरों के लिए कमें का अनुष या कमयोग! “ २.३. परिच्छेद २४ ध स्यान-गेलुड मठ ( निर्माण के समय | । व्वै-१८९८ ईस्वी । विपय--कषानयोग ष निर्विकल्प समाधि- सभी लोग एक दिन गरघ्वस्ु को प्राप्त करेंगे । ४ परिच्छद्‌ ५५ + स्थान--बेदुड मठ ( निमोण के समय ) । विपय--द कान व घुद्धा भक्ति एक दै--पूरा्रह न होने पर प्रेम की अनुभूति असम्मव है-यथा ज्ञान और मक्ति जब तक प्राप्त न हों, तमी तक विवाद दै---घर्मराज्य में बतमान मारत में किस प्रकार अनुष्ठान करना उचित ई--श्रीरामचनदर, मद्वीर्‌ ठया गीतकार श्रीकृष्ण की.पूजा का प्रचठन करना आदश्यक ईै--अवतारी मुदम ॐ आत्रिमावि का कार ओर श्रीरामङृम्ग देव का मादाय । २५ ११




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