प्रची से निकलता है सूरज | Prachi Se Nikalta Hai Suraj

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
723 KB
कुल पष्ठ :
30
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)परिक्रमाउस दिन प्रातःआंच जरा जल्दी ही सुल गयी
लया सिरहाने कोरईकैगहै
और बाते करना चाह रहा हैमै सभवत, उस समय अपनी
दिनचर्याआरम्भ करने की चित्तवृत्ति मे
था किउसने मुझे आलो के इशारे से
रोका;बोला-कभी वाचनगजा गये
हो?”मैने कहा- व्ह मैं कस-से-कम
बावन वार तो गया ही हां '
कभी उस विशाल सुर्ति को
शिरोभाग ते चरण-तल तक
ध्यान से देखा है?मैं चौका। यह आदमी इस तरह
काश्रक्न क्यो कर रहा है? कौन है
यह”मैने उत्तर दिया-दिक्िये, पहले
तोअपना परिचय दीजिये ताकि मैं
यहजान सकूँ कि आप कौन हैं और
क्या चाहते है।*इस तरह पहेली बरूझने से तो
कोई कामसरेगा नही।बोला-मैं शिल्पी हू सुर्तियाँ
बनाता हूँ।धन या कीति की लालसा से
नही,ससार-की-व्यास्या-समीक्षा के
लिए।उसमे जो सार हैउसेयुगयुगो तकपावाण मे सुरक्षित करने के
लिएदुम मुर्तिकार-और इतने सवेरे,
यहां। मुझसे क्यावास्ता है तुम्हारा?”श्रं ही चला आया) मैने सोचा-
आप वावनगजा कई बार गये हैं
एक वार मेरे साथ भी चले और
उस विशाल विग्रह की वन्दना
मेरे साथ करे”मैने कहा-'रकिये। पेट मे कुछ
डाल ले; फिरचलते हैं।'वोला-र्मं देव- दशन कै बिना
कुछ नही लेतामैने सहज ही पृछ लिया-क््या
यह नियम जैनो की बपीती है?
उन्हे ही इसे पालना चाहिये”
क्या किसी महापुरुषके दरश्नि उदर-पोषण से कम
महत्त्वपूर्ण है” क्या हमसेअपने जीवनादर्श को आहार था
उपाहार से पहलेअपनी याद मे नहीं डाल लेना
चाहिये”प्राची से निकलता है सुरज १७
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