परलोक और पुनर्जन्माक | Parlok Aur Punarjanm

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : परलोक और पुनर्जन्माक - Parlok Aur Punarjanm
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

Author Image Avatar

He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

Read More About Hanuman Prasad Poddar

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुद्च्यते । पूर्णस्थ पूर्णणादाय पूर्णभिनावशिष्तते !)दर थाट् ४ नि दि न न 2 रद. ४ हर लोग के न कद के कक + 2दर गा रत नर, ग पाए डा डा उससे दरिया 2 कक डे योग थे न जी 1 | थक करका के पक न लग 1 श्र ट्री भर हनन ्् ,« | प्र कण लि छत 1 पट न ्््हरसमा थे डा न दर री अर ५ हे रू हे नर जी न व गा किन मं के स्व न रे स्व कलहर. पल ४... एक खास मकर है एम्स समन बस सपा. दे. नल ना ३ पिया शत पा थे४. “हि है न 11104 श्र पक गज बटर हा बज 3 पे न मं '” पक कर, हि है ी दर प्‌ दा मणि 1; डी दर दर दर के ही चित दिशा हे. पद बम भी ३ हे . १५ ही | चल ना किन ३ 1 पा पन्ना । का. पा रू हा हे दे न रू पडमत नरमुण्चलू सूणन्‌ संखरयंश्र चिन्तयनू नामानि रूपाणि च मज्जलानि है। क्रियासु यस्त्वचरणारविन्दयोराविश्चेता न. करयते ॥| हि गोरखपुर, सौर माघ २०२५, जनवरी १९३५ 1 कण संख्या ५०६जिन सिर सवंप्रकादाक ज्योतिमय ]देते सूय-सोम-मण्डठको: उज्ज्वल भ्ास । अष्ट-कमलद्लपर वे नित्य स्थित हैं नारायण श्रीवास ॥ जिनके सोम-येममें अगणित हैं घ्रह्माण्ड सित्य अव्यक्त 1जो हैं कोटि-कोटि न्रह्माण्डॉके अनन्त रूपोंस व्यक्त ॥. लीलामय वे लीलाकारण धरे विचित्र विविध वह रूप ॥ दु्दान हैं दे रददे चतुसुंज विष्णु वही सब भाँति अनुप ॥थेध्टगतहिरद




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now