परलोक और पुनर्जन्माक | Parlok Aur Punarjanm

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Parlok Aur Punarjanm by हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar

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He was great saint.He was co-founder Of GEETAPRESS Gorakhpur. Once He got Darshan of a Himalayan saint, who directed him to re stablish vadik sahitya. From that day he worked towards stablish Geeta press.
He was real vaishnava ,Great devoty of Sri Radha Krishna.

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुद्च्यते । पूर्णस्थ पूर्णणादाय पूर्णभिनावशिष्तते !) दर था ट् ४ नि दि न न 2 रद. ४ हर लोग के न कद के कक + 2 दर गा रत नर, ग पाए डा डा उससे दरिया 2 कक डे योग थे न जी 1 | थक कर का के पक न लग 1 श्र ट्री भर हनन ्् ,« | प्र कण लि छत 1 पट न ्् ् हर समा थे डा न दर री अर ५ हे रू हे नर जी न व गा किन मं के स्व न रे स्व कल हर. पल ४... एक खास मकर है एम्स समन बस सपा. दे. नल ना ३ पिया शत पा थे ४. “हि है न 11104 श्र पक गज बटर हा बज 3 पे न मं '” पक कर, हि है ी दर प्‌ दा मणि 1; डी दर दर दर के ही चित दिशा हे. पद बम भी ३ हे . १५ ही | चल ना किन ३ 1 पा पन्ना । का. पा रू हा हे दे न रू पड मत नर मुण्चलू सूणन्‌ संखरयंश्र चिन्तयनू नामानि रूपाणि च मज्जलानि है। क्रियासु यस्त्वचरणारविन्दयोराविश्चेता न. करयते ॥ | हि गोरखपुर, सौर माघ २०२५, जनवरी १९३५ 1 कण संख्या ५०६ जिन सिर सवंप्रकादाक ज्योतिमय ] देते सूय-सोम-मण्डठको: उज्ज्वल भ्ास । अष्ट-कमलद्लपर वे नित्य स्थित हैं नारायण श्रीवास ॥ जिनके सोम-येममें अगणित हैं घ्रह्माण्ड सित्य अव्यक्त 1 जो हैं कोटि-कोटि न्रह्माण्डॉके अनन्त रूपोंस व्यक्त ॥ . लीलामय वे लीलाकारण धरे विचित्र विविध वह रूप ॥ दु्दान हैं दे रददे चतुसुंज विष्णु वही सब भाँति अनुप ॥ थे ध्ट गत हि रद




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