आत्म - वेदना | Aatm - Vedana

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Aatm - Vedana by प॰ पद्मकान्त जी मालवीय - P. Padmkant Ji Malaviy

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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८ १६ ) है कि जो लोग गे के साथ कहते हैं कि “साई, हम तो पंत जी को समझ ही नहीं सकते” उनको भी यहाँ ने समझने का कोई वहाना नहीं पिता । सुरदास के कुर उनकी अरिट विदा के चाहे जितने अच्छ उदाहरण हों किन्तु कवि सृरदाख की महानता के सद्यं । उनकी महानना तो उनके तीर से सीधी चोर कर्मे चालें पदों की सरल महानता, तथा मघुर गरिसा पर स्थित है । कथि क धिकास ही इस प्रकार होता है । प्रार्स्स में साषा जरि, अटत, तथा स्पन्दन हीन सी रोती हैः । यड्‌ बड़ शाब्द रहने है किन्तु उन बड़ वड्‌ शब्दों म भाव चये दी रहते है । पंक्तियां हदय को सीधे स्पदां नदीं कर खकर्ती । वे सीधी, जान दार, और पुरअसर नहीं होतीं । किन्तु ज्यों ज्यों कथि उन्नति करता हैं, उयों ज्यों उसकी कला तथा स्वयं उसका विकास होता ह, ज्या ज्यों उसकी कर्म मजती हैं, भाव गहरे, विचार सार- गर्भित होते जाते हैं, त्यों त्यों भाषा पर से म्रेल दृटती जाती चह घिदुद्ध तथा परिमाजित होती जाती हे; उसमें सर्ठता, तथा गम्भीरता, मघ्युरता तथा प्रचार, जीवन तथा. -दाक्ति उम्ती जाती र, पिथ साव स्था यद्धमचव की गहराई से स्पन्दित हो उठती हैं; और पाब्दों में अर्थ आँखों से स्वल उठते हैं तथा उनसे जआॉग्ल पिलात हो हृदय समझ जाता है कि उनसे कया क्या सर दुआ हैं । “घन घमंड सभ गरजत घोर, पिवानदीव डरपत मम मारा ।”' पदट्कःर पंडित अथवा अपंडित सभी पक साथ जम उठते हैं । जो असली जाद है घह सब पर असर करता है--बाद को और विचार कर पंडित गण कर्टामक विवेचन कर कर के चाहे और मुग्घ होते रहें, किन्तु असली जादू जो पंक्तियों का है चह




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