प्रसाद - साहित्य में नारी | Prasad Sahity Men Nari

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Prasad Sahity Men Nari by रजनी कपूर - Rajani Kapur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सफमेव 7 दितीयम नह नाम तिकिचिनम तब उसमे आत्ममंधन के द्वारा नारी की साध्टि की । पुरुष रुप मैं बहस और प्रकाति कप भैं सत्री , दोनों {क्क्‌ अगि की सॉष्टि कर सकते मैं सम हुस | दभर स्क ही तत्व के दो अनुपूरक अंग हैं । ऋग्वैद मैं नारी त्व का सवत्कृष्ट रूप दैव्य के वर्ण ना में तत है। विमिनन नारियाँ के दुष्ट ति इस प्रकार हैं , जैसे अदिति स्वाधी सता की देवी माती गहँ है , जौ साष्टि का संचार और अंघनों से मुक्ति प्रदान करती ह, इन्दुएनी अपनि स्थाग अर बछिदिन मै रन्द को बलवान बनाती है , दूसरी और पत्नी के रुप मैं को प्रकट हौती है । सूयाँ आदर हिन्दू वधू का प्रतिनिधित्व काती है । सक और संगीत की देवी सर्रवती है, तौ उभा प्रकाश की देवी के डप मैं प्रॉ ता ज्ठत हुई है । इस प्रकार वैदिक कॉथ्ययों ने सदिये कौ नारी कै रूप मैं देशप है । प्राकातिक धदिये है संपन्न रभ का विनि वैदिक काठी न काँवियों ने सक लावण्यमी नारी कै रुप पश्यि है। ऋग्वेद के प्रमाण के जाधपर पर कहा जा सकता है गक माता-पिता कदु स्व प्रैम कि अदायरपाशि कम्था को प्राप्त होती थी । अन्ेद मैं कम्या और माता-पिता कै संबंध का निरश्फणण जथ प्रकार शक्थि गया है `~. * संग माने युवती समस्त रवसारपजामी पपिब्रोरूपएये ।* = ऋ रक हू (परस्पर उपकारी माव ध युक्त नित्य तार्ण युवती और जामात पिता की भौद मैं बैठते हैं ) गारी की शाक्त और महत्व का केत्रोत उसके प्रेम मैं कौता था , तथा वही पति भाग्यवान समकप जाता था । जौ प्रैममयी पत्नी को प्राप्त क्म्‌ थक | पिरि निति तानि माया ति ततिः सोः सिति चि ति १- बच्दारण्यक उपा मु र ऋभ्व [द ध्री ८ । । तथौ ज्येव कु ह |




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