ध्वन्यालोक | Dhvanyalok

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रेरतावनां {६ है, उनके सत कौ परीता दूरे ग्रन्व मे करेगे, } प्रसिनवगुप्त के अचु्ार यह्‌ दुष ग्रन्थ धर्मोत्तर की विनिश्वयटीका वी टोवा है 1 प्रसिद्ध बौद्ध श्राघार्य घर्मकीति ने बौद्ध दर्शन पर 'प्रमाणविनिश्चय' ग्रन्य निवा था। इस पर श्राचायं धर्मत्तिर ने ्रमायविनिश्वयटीका” लिखी 1 झामन्दवर्वेन ने इस टीका पर टीका लिखी होगी । मै धर्मकीति से निश्चित रूप से परिचित रहे होंगे, क्योंकि उन्होंने उनके श्लोक को ध्वन्यालोव में उद्धृत स्या है 1 श्रानन्द वर्धन की एर भ्रन्य रचना “तत्वालोक' मा उत्लेख श्मिनवगुप्त मे शोचन टीवा में दिया है । प्रतीत होता है हि ग्रन्थ झ्दैतवेदान्त दर्शन पर होगा । भ्रानन्दवर्धनने दुघ मौर भी दाशंनिक रचनायें एव काव्य लिखे होगे, जिनके नाम हमको विदित नहीं हैं । उन्होन “ध्वन्यालोक' में ही कुछ श्लोक उदाहरणों के रूप में ऐसे लिचे हैं जिनको वे ग्रपनी रचना बताते है” 1 सुभाधितावसियों में भी भ्रानत्दवर्धत के नाम से कुछ श्लोर उद्धृत फिंये गये हैं । १, यत्त्वविदेश्यत्व सवंलक्षणविपय वौद्धाना प्रत्तिद्ध त्तम्मतपरीक्षाया प्रवान्तरे निरूपपिष्याम,. । ध्वन्यालोक ३.४७ पौ वृत्तिम 1 २. प्रनान्तर इति । विनिण्चयरोक्राया धमेत्तिय या वित्त्तिरमुना प्रन््रता शता त्रैव १द्‌ व्याच्यातम्‌ । उपरोक्त पर सोचनटीका ! इः लावण्यद्रविएाव्ययो न गरित्तः वतेणोमहान्‌ स्वीषटनः स्वच्छन्दस्य शरुत जनस्य वक्ततरिवन्तानसो दीपित. । एषाम स्वकोद ठुत्यरमएाभावाद्रराको हता कोश्गश्येतसि वेघरा विनिद्तिरतन्व्पास्तनु तन्दता ॥ पत्त्र ्याजस्तुतिरलद्भार तषा चाप पमेकरीने. शतो इति प्रधिदि 1 ध्वन्या ३.४० मी वृत्ति मे ४, येऽप्यविभदत स्पोटः धाच्य तदयं चाद, तैरप्यविदापदपतिते: रर्वेपसनुन शरएीया प्रहिया । तदुतीरंत्वेनुमवं परमेश्वराय ब्रह त्यत्मच्छास्सररेण न तिहि सर्वास प्रथ विर्चयतेत्परताम्‌ । कारिषा १६ वृत्ति पर लोचन टीवा से 1 शास्यनय इति । तत्राम्वादपोप्राभावे पर्येणा््येतत द-पयतेव व्यददेशः प्रदरः, चपटकारपोने सु स्मध्यषदेण -द्नि भाव 1 एतच्च दरन्पङरेता छल्यातते वित-योकनन्‌ दहु व्यम मुष्पो्वमर दति नास्माभिरतद्‌ दशितमू । बारिषा ४४५ की वृत्ति प्र पसोयनदीश से 11 ५, यपा मपेव-- या स्यापारयनो ररान्‌ रयिदु बारिन्‌ स्योन नडा, हथ्टियशिरिरिप्टिवाएंविपपो मेपा. थे. बैप्रश्वियरी । हे दे प्रप्ययपम्म्य विददमनि्ं निया दसवीं धयं, थाना ने थे तब्पमध्पिविपय ! रयदूभक्तिदुयं सुखयु 1 धयस्यातोत अदर दी युत्ति से 3




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