भागवत दर्शन भाग - 64 | Bhagawat Darshan Bhag - 64

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Bhagawat Darshan  Bhag - 64  by श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी - Shri Prabhudutt Brahmachari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका, ९ श्राप गिरा गिसकर पथमे ्रसरित हो जाते टं । सव -पुष्पौ, के तो सुरे नाम भौ न याद होंगे :पाटल _ ( कमल ) -यूधिका ( जूद्दी ) मलिंका ( चमेली ) जाति ( वेला ) अगर, तगर माधवी रजनीगंधा ( सतरामी ) पारिज्ञात ( दारसिगार) जयाये ता स्थाई है, रेप कितने ही सामयिक पुप्पोंके पीपे लगते है । फलके वृत्त फलके चाहुल्य से लदे रहते हैं । चड़े-चड़े फलोंसे युक्त पंक्तियद्ध पपीतोंके धृक्ोंकों देखता हूँ, ता चित्त प्रसन्न हा जाता है, '्मरूद फलोंके भारसे झुक हुए चायुमें भमते, हुए. प्रथिवी को चूमते हुए जच प्रयाग के प्रसिद्ध 'झमरूदोंके यृष्तो का श्रषने श्रास पास म देखता हूँ, तो मन मुकुर ख़िल जाता है किन्तु फल मिलते नदीं । शका के भंड के मड अजाते हैं, कुं खाजति है छु छतर कुतरकर फेंक जाते हैं, प्रिलदरसिय भो क्यौ खोजने जार्येँ । वन्दर तो यहाँ हैं नददीं कभी कमी एक दो ध्या जाते दै! उन्दे भगा दिया जाता है, किन्तु दो पैर के ये वालक न्द्र तो घन्दसें के भी दादागुर हैं, मैं चियेशी स्नान करते जाता हु तनिक भी कोट गदरा हुआ फल देखा, इधर-उधर दृष्टि वचाई तोड़ लिया {माग गये, किसी दूसरे लद्केनेदेल लिया तो उते भी कं देदिये । आश्रमे लड्कों के अतिरिक्त प्रयाग के लोग भी श्या जाति हैं, टटके पेड़ पर लगे फलों से किसका मन नहीं मचल जाता । पुष्पं चा क्लं द्र चरा च नव यौवनाम्‌। विजने कचनं च्छ्रा कस्य न चलते मनः॥ सुन्दर पुष्प लगे दों, मन मोदक फल लगे हों, एकान्त में सुवर्ण पड़ा हो, तो,किसका मत न ललचा जायगा। सो फल न भी 4. तो है ही फलवान्‌ वृक्त छुटिया में लगे हैं । गत वर्ष २ इन कर;




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