एक बूंद एक सागर भाग - 5 | Ek Boond Ek Sagar Bhag - 5

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Ek Boond Ek Sagar Bhag - 5 by समणी कुसुमप्रज्ञा - Samani Kusumpragya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१५ एक ही व्यक्ति के विविध चिन्तनपरक वचनो का यह अनूठा और अद्वितीय संग्रह साहित्य-जगत्‌ के लिए भी अभूतपूर्वं उपलब्धि है, इसमे संदेह नहीं । सूक्ति-संग्रहो मे प्रायः अनेक सनीपियों के मामिक कथनो का संग्रह रहता है । हिन्दी भाषा में प्रकाशित संग्रह प्रायः इसी प्रकार के है। यह संग्रह उनसे भिन्न और विशिष्ट बन पड़ा है, ऐसा हमारा विदवास है, परन्तु निणेय तो पाठक ही कर पायेगे । यह हमारे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात है कि हमे प्रत्येक खंड के लिए एक मूर्धन्य विद्वान्‌ ओर समालोचक साहित्यकार का निष्पक्ष मूल्यांकन उपलब्ध हो पाया है, जो यथास्थान प्रकाशित है । आचार्यश्री हारा संस्थापित समणी वे की अनेक-विध सेवाओं उनकी साहित्यिक सेवाएं भी बहुमूल्य है। समणी कुसुमप्रज्ञा जी ने सम्पादक एवं सह-सम्पादक के रूप में एका्थके कोश' एवं देशी शब्द कोर' जैसे बहुश्रुत विद्वानों द्वारा प्रशंसित कृतियों कै वाद “एक बूद : एक सागर” जैसी अनुपम कृति को उपस्थित कर लोक- कल्याण की भावना को साकार किया है । डी ग्रंथ अपनी यात्रा में अनेकों विद्वानों के हाथों से गुजरा है, जिनके सुझाव वहुत उपयोगी रहे है । सभी सहयोगी विद्वानों के प्रति हम हादिक धन्यवाद ज्ञापित करते हैं । --श्वीचंद रासपुरिण




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