कबित्त रत्नाकर | kavitti ratnakar

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
12 MB
कुल पष्ठ :
364
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)भूमिकां
“काम भूप सोव॑त सो जागत दै, कहं कए वयःसंधि को वदी ही उत्तमतां
से व्यंजित किया गया है, साथ ही प्रभात के रूपक कै विचार से भ वह् नितांत
उपयुक्त है ।
'खंडिता, के वणन में कुछ कवियों ने महावर आदि के वर्णन के साथ
. साथ दृन्त-तृत, नख~ठत श्रादि फा वणेन भी बडे समारोह के साथ किया है ।
सेनापति ने भी एक कवित्त मे देसी ही तत्कालीन अभिरुचि का परिचय
दिया है- ं
बिन हीं जिरह, हथियार चिन ताके अव,
भूलि मति जाह सेनापति समभाए हौ ।
करि डरी छाती घोर घाहन सौं राती-राती .
मोहि धौ बतावौ कौन माति टि आए हौ ॥
पौढ़ौ बलि सेज, करों औषद की रेज बेगि,
में तुम 'जियत पुरबिले पुन्य पाए ह ।
कीने कौन दाल ! बह बाधिनि दै बाल ! ताहि `
कोसति हं लाल जिन फारि फारि खाए हौ# ॥
कहाँ तो शगार रस के आल्ंबन भिभाव का वर्णन और कहाँ 'बाधिनि'
तथा मल्हम-पट्टी की चचां ! बचन-वक्रता बड़ी सुन्दर दोती है, किंतु वह “फारि
फारि खाए” बिना भी श्रदर्शित कीं जा सकती थी । “खंडिता” के न्य उदाहरणों में
अधिक सहदयता- से काम लिया गया है |
'नचन-विद्गधा' के वशेन में कभी कभी व्यंजना से श्रूं सदायतां `
मिलती है, पर सेनापति ने इसके वर्णन में प्राय: श्लेघालंकार से सहायता ली है।
इसके कुछ उदाहरण पहली तरंग में पाए जाते हैं। और उनमें शाब्दिक कीड़ा
की ही प्रधानता पाई जाती है। किसी किसी छंद में “'अश्लीलत' दोष भी आआ
गया है। “अश्लीलत्व' के संबंध में यह कद देना झप्रासंगिक न होगा कि वह
. सेनापतति के “श्र गार वर्णन” में बहुत-कम पाया जाता है । बह केवल पहली तरंग में
.. ही कतिपय स्थलों पर देखा जाता है। कवि वहाँ पर शतेष लिखने मे तत्पर
# दूसरी तरंग हंद ६९ ।
† पहली तरंग, चंद ७१, ७, ८१ ।
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