प्रतिपाद्य विषय की झांकी | Pratipadya Vishay Ki Jhanki
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
430
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)३
गुप्रजी के एक दृखरे काव्य “जयद्रथवधः खी ओर दशि
'पात करें तो उसमें मुख्यतः तीन स्थल ऐसे हैं जो करुण रस के
आलम्बन बनाए जा सकते हैँ :-
१. अभिमन्यु की वीरगति
२. उत्तरा का विाप
३. जयद्रथ काकवध
इनमें प्रथमदोका कारण्य तो जीवन का उत्कपे-विधायक
है, किन्तु दतीय का नहीं । अतः हमारे कवि ने प्रथम दो प्रसंगो
का तो सदानुभूति ओर समवेदनापूणे चित्रण किया हे; किन्तु
तीसरे, अर्थात् जयद्रथ वध के प्रसंग को, न केवल भगवान की
इच्छा कह कर टाछ ही दिया; श्रस्युत उसे धमराज भीर अजुन
ऊ सुख-संमिलनः का प्रष्टाधार भी वनाया । यद है गुप्तजी का
आदशंवाद । 'गिरीश' ने ठीक ही छिखा है कि इन्दं “मानवः
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