देवेन्द्र मिलाप | Dewendra Milap

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
9 MB
कुल पष्ठ :
449
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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लेकिन विपल्य परमक समता कभी नहीं कर सक्त ट ॥
प्रेम विवश हो प्रेम दाकि से विधिने खेल पसारा है ।
टिके हुए घह्मांड अनेकों केवल प्रम सहारा है ॥ 2३७
चर असू अचर प्रस के बल से जगमें जीवित रहते हैं ।
ईश्वर प्रम परम ही ईंदवर एसा पंडित कहते हैं ॥
पाकर उसी प्रम मंदिर से अनायास हीं प्रस प्रसाद ।
परम मझ होकर परमी जी क्या न भूलते तन की याद ॥ ३८
भः र चः
कालिज़ में भी उसी प्रेम का खुख दायक रख घाल दिया ।
सहज स्वभाव स्वमान भावस चरम खजाना खाटः दिया ॥
जीचन का सुव मून्ट प्रम ही जीवन सूरि समान हुआ ।
साते पीन सात जगते सवम प्रम प्रधान द्आ॥ ६९.
बाहर भीतर तनमें मन में चाल ढाल मं समा गया]
नस नस में रख भिंदा प्रम का बाल वाल में समा गया ॥
मनस वाचा आर कमणा पावन प्रस प्रकाइश छुआ 1५बरदा परस्पर प्रेम दिन्टांमंरागघपका नाद्रा हुआ ॥ ५०¢
२५
४:उडगण सहित चन्द्र का जेस सूय प्रकादित करते हैं ।
चिना परिश्रम अनायास ही अंधकार को हरते हैं ॥दमा तरह से प्रमी जा का सव पर पूण प्रभाव हृञ।सतत संगी युवकों के दिलमें प्रेम भक्ति का चाव हुआ ॥ ८
सेवा सक्ति प्रेम के बल को भलीभांति से मनन किया ।
प्रम कुटी में सच्च प्रेमी मित्रों का संगठन किया ॥प्रम देव के सन्मुख करके मुस्तदी मे कोल करार ।प्रम मेडल्टी वनी अनोखी सभा सदो का बढी शुमार ॥ ४२९(॥न प तपन न पैर+.पर पका पिन तौ त क पन िय पफय> 44[3१ क पर पाा पर
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