फिरदौसी | Phiradausi

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Phiradausi by जि. जाषुवा - Ji. Jashuvaदुर्गानन्द - Durganand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उस विचित्र स्वप्नस्सति में कवि ने रात बिता दो जब सूरज ने फूँक उडादी पूर्वी गिरि पर कुकुम घूली तब | हिम कर सोधा पश्चिम गिरि में खत हो भस्मच्छबि में तारा मंडल बस ड्रब चले फेनिल-से उस नभ में। खद्तानी - महलां पर बज उठा पक नगारा आमलित निनदो से मूज उरी मखजिद सारी। इय-द्ाला से हिला केश घ्ाडेने ललकार, कचघि बैठे यह प्रांगण के स्वर्णात्न पर मन मारे | पक तभी फारदीक जो संभ्रम सकुल हो घाया बोला--स्वर उस का गदू गद, कंपित उसकी काया कविवर ! दोडा सुख काखुदर दम्य तुम्हारा द्रया कद कर आने पच बढाया कवि-पल्लीका लिख भेजा । करचरणों को जीवित प्रतिमा वषत्रय का लाल दुलारा पुत्र नाम का पहला प्यारा चला गया अब कोन सद्दारा'! इदय थाम कर पत्र पढ़ा ता अंगों में दुख कष्ताप बढ़ा | गुम शुम उस तुक नगर की ओर दरीघ्न चङे तव चरण बढ़ा ।




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