निजानन्द | nijanand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( २६) शाके जे दासि हैः सवके षे है दास सव ही उनके दास है, जिनकी दासी अश्‌ ॥ जिनकी दासी आशु पूज्य सव के वे होते । निश्चिन्त निदधम्द, जागते सुख से सोते ॥ चित्त | बात ले मान, मित्र | भज पूर्ण निराशा । सादर भज विश्वेशु, परणं हो सव ही आश! ॥ (३० ) ब्रह्मादिक के लोक भी, नही दुःख से मुक्त । नश्वर तो है सवं ही, कुं रागादिक युक्त ॥ कुछ रागादिक युक्त, वहां सुख ना हो सक्ता । काल खड़ा जरह शीश, कौन सुख से सो सक्ता ॥ चित्त | घात ज्ञे मान, मती चाहे स्वगादिक । इन्दरादिक हैं तुच्छ, सतस्य नाही बह्मादिक ॥




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