प्रकृता भासा और साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास | Prakrta Bhasa Aur Sahitya Ka Alocanatamaka Itihasa

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Prakrta Bhasa Aur Sahitya Ka Alocanatamaka Itihasa by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आमुख ५ शृद्धार भौर जीवन सभोग सम्बन्धी चित्रों के अतिरिक्त दाब्द और अथं चमत्कार से युक्त अनूठी सुक्तियाँ भी प्राकृत साहित्य में विद्यमान हैं । दुष्ट के स्वभाव का दलेप और उपमा कै द्वारा सुन्दर चित्रण किया है । यथा-- वसइ जहि चेभ खरो पोसिज्जन्तो सिणेहदा्णेहि तं चेअ आलं दीभओ व्व भइरेण मइलेइ ॥ गाथा० २।२ । जिस घर में स्नेहदान द्वारा खलजन सवद्धित होते है, स्नेह-तेलदान हारा पोषितं दीपक की भाँति वे उस घर को शीघ्र ही मलिन बना देते है । जे जे गुणिणो जे जे चाइणो जे वियरद्धावण्णाणा | दारिद्ध रे विअवखण ताण तुमं साणुराओ सि ॥ गा० ७।७१। हे दारिद्र, तु सचमुच कुशल है, क्योकि तु गुणियो, त्मागियो, विदग्धो एवं विन्ञानियो से अनुराग रता है ज जि खमेइ समत्थो, धणवतो ज न गन्वमुव्वहुइ ¦ ज च सविज्जो नमिरो, तिसु तेसु अलूकिया पहवी ॥ वल्नारग्य ८७ | सामथ्यंवान्‌ जो क्षमा करे, घनवान्‌ जो गवं न करे, विद्वान्‌ जो नम्र हौ--इन तीन से पृथ्वी मलकृत है । दान का महत्त्व बतलाते हुए लिखा है-- किसिणिज्जति लयता उदहिजलं जलहरा पयत्तेण । धवलीहुती हु देता, देंतलयन्तस्तर पेच्छ || वल्ञा० १३७ | बादल समुद्र से जल लेने में काले पड जाते हैं और देने में--वर्षा हो जाने के उपरान्त, घवल हो जाते है, देने और लेने का यह अन्तर स्पष्ट देखा जा सकता है । शील की महत्ता का निरूपण करते हुए कहा है-- भधणाण घण सीर भूसणरहियाण भूसण परमं । परदेसे नियगेह सयणविमुङ्काण नियसयणो ॥ आख्यानमणिकोश २९ अ०, २८४ गा०, पु° २५४ | दील निघंनो का धन है, आभूपण रहितो का आभूपण ह, परदेश मे निजगृहं हँ ओर स्वजनों से रहितो के लिए स्वजन है । भअविचारित कार्य सदा कष्ट देता है, इससे व्यक्ति का मन सदैव पश्चात्ताप से जलता रहता है । कवि अविचारित कायं के पश्चात्तापं का यथार्थं चित्रण करता हुआ कहता हु न तहा तवेइ तवणो, न जलियजलणो, न विज्जुनिग्घाओ । ज॑ अवियारियकज्ज॑ विसवयत तवइ जतु ॥ गाख्यानमणिकोश, ५।९९५ पु० ९४ |




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