श्री भागवत - दर्शन भागवती - कथा भाग - 43 | Shri Bhagawat - Darshan Bhagavati - Katha Bhag - 43
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
280
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)रासलीला और धमे सयोदा १५.
ज्नावी है; बड़े बड़ों से हो जाती है, किन्तु उस भूलकों भूल
क्षमम्ध्कर उसके लिये पश्चात्ताय करना--प्राग्रस्वित्त करना- यह्
उन्नततिका लक्तण है। पाप करके उसे छिपाना, गर्व करना श्रोर
झनेक युक्तियों से उसका समर्थन करना, यदी पतनका निप्क-
पटक राजमार्ग है. ।
कुछलागों का कथन है कि इस 'झनाचर कदाचारका मूल
कारण है रासपंचाध्यायी । यदि इस ॒रासपंचाध्यायाको दीः
भागवतसे निकाल दिया जाय, तो सव भंमट दूर दो जाये | इस
रसीली कामवर्घेक कथांकों ही पढ़कर लोगों की ऐसी श्रवृत्ति
| होती है ।
६ यहुतो वही घात हुई कि नाकपर मक्खी श्राकर वैठती है इस
लिये नाकको ही काट दो । ईश्वरके कारण ही अनेक मतमतांतर
ष्ठति है, इसलिये ईश्यरको ह मिट दो । धर्मके नामपर ही कलदः
होती द, श्रतः धर्मको ही तिलाञ्जजिदे दौ! ईश्वर धर्मो
कोई मिटाना भौ चाहे, तो नहीं मिटा सकता । इसी प्रकार श्रीमद्
भागवतमें से रासपद्चाध्यायी निकाली ही नहीं जा सकती } वही
तो मागवतके पंचप्राण हैं । रासपंचाध्यायी के पढ़ने से काम भावना
की ब्ाद्ध नहीं होती, श्पितु कामवासनाका शमन होता हैं ।
मेने पाठटकोको व्यालीसवें खर्डमें अश्वासन दिलाया था, कि
मै इस सम्बन्यर्मे अपने जीवनकी एक सत्य घटना सुनाउँगा
उसे 'चोवालीसवें खरडमें पाठक पढ़ें । भगवानकी रासलीला
एक आत्मरमणुकी लीला है। वह सके से नहीं जानी सममही
जा सकती । रासपंचाध्यायी का नित्य श्रद्धासे पाठ करने से ही
जानी जा सकती है । रासके नामपर कदाचार करने `
व्यक्तियों का उल्लेख करना भी पाप है, पदिद्र कार्यों के
सदासे स्वार्थी लोग श्वनावार करसे श्याये हैं कर रहे
शांगे करेंगे । जिसका जिससे सख्ाथं खथता दै ..
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