रामानन्द - सम्प्रदाय तथा हिन्दी - साहित्य पर उसका प्रभाव | Ramanand - Sampraday Tatha Hindi - Sahity Par Usaka Prabhav

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Ramanand - Sampraday Tatha Hindi - Sahity Par Usaka Prabhav by बदरी नारायण श्रीवास्तव - Badri Narayan Shrivastav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० रामानन्द सम्प्रदाव तथा हिंदी-साहित्य पर उसका प्रभाव वैष्णव धमं का विकास विद्वानों का मत है कि विष्पुभक्ति का मूल रूप वैदिक काल में ही मिल जाता है ।* कुछ ऋचाओं में 'विष्णुलोक के प्रति कामना”, “विष्णु की कृपा के लिए प्रार्थना” जैसी भावनाएँ: भी व्यक्त की गईं हैं | कुछ झन्य विद्वानों ने नवधघा- मक्ति, ब्रह्म के नराकार रूप तथा झबतारवाद के कुछ सकेत भी वेदो मे पाए है ।३ वह्यं विषु की शक्तियो का उल्लेख करते हए उन्दे ज्िविक्रम कहा गया है । वामनावतार का मूल यही कल्पना है ।* उन्हें सूयदेवता भी कहा गया है ।* भग की कल्पना-शुभाशीर्बादों का प्रदाता-भी वेदों मे मिलती है; जो श्रागे चल कर भगवान्‌ या भगवत्‌ को परमोपास्य मानने बाले भागवत घमं का श्राधार बनी | विष्णु वैदिक-युग के एक प्रधान देवता हैं । उपनिषत्काल में ब्रह्म के निगुण-सगुण रूप की विवेचना ्रधिक हुई, किन्तु, निगुण की श्रपेच्ता सुण का महत्व क्रमशः बढ़ता गया। विष्णु में मानवता के गुणों का श्रारोप हुआ आर उन्हें चरम प्राप्य मानां गथा | उनकी प्रा्ति के लिए श्रहिसात्मक यज्ञोका भी विधान हुश्रा।* 'बाल्मीकीय' रामायण में श्रवतारवाद की पूरी प्रतिष्ठा दो गई, यद्यपि विद्वानों के मत से यह्‌ श्रश उसमे बाद में जोड़ा गया । महाभारतः के पाचरात्र मत मे बैष्णव- धर्म की निश्चित्‌ रूपरेखा बन जाती है ।< सर श्रार० जी° भरुडारकर के मत से ईसा से ३००-४०० वेषं पूव वासुदेव नामक देवता की उपासना का प्रचार था ग्रौर इस ध्म के श्रनुयायौ भायवत कहे जाते थे ।९ विदेशिर्थोने भी इस धर्म को श्रपनाया था | यूनानी राजा एन्टिश्चलकिडास के राजदूत देलियोडोरस की परम भागवतो हेलियोडोरस' कह कर पुकाय जाता था [१० १-- वही, प° ६६७ तथा ^मागवत्त-सप्रदायः-बलदव उपाध्याय, ए० ५१-८७ २-- वैष्णव धमे का विकास न्नौर विस्तार , कृष्णदम्त मारद्वाज, एम०ए०, कल्याण, वषं १६, भक ४, प० नददुलारे वाजपेयी द्वारा महाकवि सूरदासयथ मे प° २ पर उद्धत । २-- वही, ए० ३ । ४-- भारतीय सस्छृति-शिवदत्तक्नानी, प° २०७। ५-- इण्डियन्‌ फिलास्षफी-राधाकृष्णन्‌, प० ६६७ । ६--वही, पू० दुख | ७--वैष्णव धर्म का विकास और विस्तार, कर० द ० भारद्वाज, कल्याण, वषं १६, भक ४। ८-इड्यन फिलास्ी, १० &€₹७। ६~-श्वैष्णविंडम श्रादि-मण्डारकर, प° ६ 1 १०- भारतीय सस्कृति, शिवदत्त क्ञानी, ० २३६- बेसनगर शिलालेख ।




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