श्रीमद्भगवद्गीता | Shreemadbhagavadgeeta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना तेरे के संबंध में भी है। गीताकार ने खयं मदान्‌ र दृ शब्गे के यथं का विस्तार किया है । गीता को उपरी दृष्ट से देखने से सी यद बातत माट्म हो जाती दै । गीता-युग के पते वदाचत्‌ यक्त मे पशु-हिंसा भान्य रही हो । गीता के यक्ष में उसकी कह्दीं गंघ तक नहीं है। उसमें तो जपयक्ञ यन्नों का राजा दै | तीसरा अध्याय बतलाता हैं कि यज्ञ का अथ है मुख्य रुप से परोपकार के लिए शरीर का उपयोग । तीसरा श्रौर चौथा अध्याय मिलाकर दूसरी व्यास्याएं भी निकाली जा सकती दे । पर पशु-हिसा नहीं निकाली जा सकती । बही वात भीता के संन्यास के श्रथ के संबंध में है । कर्म-मात्र का त्याग गीता के संन्यास को भाता दी नददीं । गीता का संन्यासी अतिकर्मी है तथापि '्नत्ति-अ-कर्मी है। इस प्रकार गीत्ता- कार ने मद्दान्‌ शब्दों का व्यापक अथ करके झपनी भाषा का भी व्यापक श्रथ करना हमें सिखाया है। गीताकार की भाषा के “छक्षरों से यदद चात भले दी निकलती हो कि संपू कम-फल-त्यांगी हारा भौतिक युद्ध दो सकता है; परत गीता की शिक्ता को पूणे- स्प से श्रमल मे लाने का ४० ऽषेतक सतत प्रयत्न करने पर सुत्त तो नम्रतापूर्वक ऐसा जान पढ़ा है कि सत्य नौर र्हिसा का पृं रूप से पालन किये बिना संपूण कम-फल-त्याग मनुष्य के लिए असंभन है । गीता सूचर-अंथ नहीं है । गीता एक मद्दान घम-फाव्य है। उसमे जितना गहरे इतरिये इतने दी इसमे से नये और सुन्दर श्यं -लीजिये ¦ गीता जन-खमाज के लिए दै, उसमे एक ही बात को अनेक भकार से कद्दा दे । अतः गीता मेँ भये हृए महाश्टो का झथ युग-युग मै वेदता चौर निस्त होता र्मा गीता का -मूलमंत्र कमी नदी बदल सकता । वह मं जिस रीति से सिद्ध 'किया जा सके उस रीति से जिश्ञासु चाहे जो अथ कर सकता है ।




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