अधिनायकतंत्र | Adhinayakatntra

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Adhinayakatntra  by गुप्तनाथ सिंह - Guptnath Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९ ) करने के लिये उसके मुख्य-मुख्य लक्षणों पर विचार कर लेना आवश्यक है । अधिनायकतंत्र का पहला लक्षण पुराने करायदे-करानूनों की उपेक्षा करना है। वह पुराने नियम-क्रानूनों को तोड़ कर ही अपना जीवन आरंभ करता है । इसकी स्थापना पुराने राजनियमों में महान्‌ परिवंतन के पश्चात्‌ होती है। इसका अर्थ यह नहीं समभ लेना चाहिए कि अधिनायकतंत्र में कोई क्रायद्‌ा-करानून होता हो नहीं । नियम-करानून हाते है, किंतु अपने ढंग के सर्वथा नवीन । यह तत्र पुराने नियमों की आधारशिला पर नीं रिकता । आवश्यकतानुसार नित्य-नए नियम-करानून बनते श्रौर नबिगडते रहते हैं । अधिनायकतंत्र का दूसरा लक्षण उसमें लोकमत के भाव का होना है। लोकतंत्र में राज्य के प्रत्येक नागरिक का शासन में प्रत्यत्त अथवा परोक्त रूप से कुछ न कुछ हाथ जरूर रहता है । इसके विपरीत अधिनायकतंत्र में एक अधिनायक अथवा एकाधिक व्यक्तियों का अधिनायक-मंडल संपूण जनता पर शासन करता है । जनता की सम्मति का को मूल्य नदीं होता । वस्तुतः सम्मति ही नदीं ली जाती । अधिनायकका आदेशी क़ानून का काम देता है। क्रांति के पहले जिन लोगों के हाथों में शासनाधिकार रहता है, अधिनायकतंत्र की स्थापना के पश्चातू उनके अधिकार छिन जाते हैं। इस पराजित पक्ष पर विजयी वगे (अधिनायक-पक्तः का शासन-चक्र चढछता है । अधिनायकतंत्र का तीसरा लक्षण झधिनायक का अपने




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