खोजकी पगडंडियाँ | Khojaki Pagadandiyan

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Khojaki Pagadandiyan by मुनि कान्ति सागर - Muni Kanti Sagar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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== १ ३ == खोजकौ पगडंडि्यां' तीन भागोमें विभक्त ह--ललितकला, लिपि और भौगोलिक यात्रा । तीनों विभाग एक ही विषयपर केन्द्रित हैं। जितना बौद्धचित्रकलापर अद्यावधि प्रकाश डाला गया है, उतना जैन चित्रकलापर नहीं । हि. दीमें जेन-चित्रकलापर प्रकाश डालनेवाली सामग्री अत्यन्त सीमित हं। ललितकलाके समस्त निबन्धोपर मुभे कृ नहीं कहना, किन्तु जहाँतक सम्भव हो सका और उपलब्ध साधन मुभे प्राप्त हो सके, उनका उपयोग करनेका प्रयास किया गया हं । भारतीय भित्ति- चित्र ओर मुगल राजपूत पूर्व विकसित चित्रकलाकी मूल्यवान सामग्री जैना- धरित ग्रंथस्थ वाडमयमं ही सुरक्षित रह सकी हं । हिन्दू धर्माश्रित चित्रकला- पर एक निबन्ध इसमे जाना आवश्यक था, किन्तु ठीकं समयपर तयार न हो सकनेके कारण न जा सका, इसका खेद हं। इस विभागकी दूसरी मुख्य अपूर्णता चित्रोंका न होना है । मेरे जेसा भिक्षु उनको कहाँ जुटाता फिरता ? जीवन सतत पयेटनरील रहनेके कारण कलाविषयक नवीन सामग्री उप- रन्ध होती ही रहती ह । इन पं क्तियोके टिखेते समय अनायास मुभे एक ऐसी जैनाश्रित चित्रकलाकृति श्रीयुत चॉँदमलजी सोगानी द्वारा प्राप्त हुई जिसके उल्लेखका लोभ संवरण नहीं कर सकता । मेरा तात्पय सचित्र भक्तामरस्तोत्रसे है। यों तो इसकी दर्जनों सचित्र प्रतियाँ मेरे अवलोकन- मे आर हे पर इस प्रतिका महत्व जितना धार्मिक दृष्टिसे हे, उससे कहीं अधिक हिन्दी भाषाविज्ञान ओर चित्रकलाकी दुष्टिसि हं । विशिष्ट प्रकारके भावोंका चित्र द्वारा प्रकाशन आजके मनोवज्ञानिकोकौ देन मानी जाती ह । यह्‌ कृति उसका अपवाद ह । प्रत्येक काव्यके प्रत्येक वाक्यका इतना सुन्दर और सफल अंकन अन्यत्र शायद न मिलें । कलाकारने एक एक भावमूलक वाक्यका स्वतंत्र चित्र खींचकर तात्कालिक मनोविज्ञान- का सुन्दर स्वरूप उपस्थित किया है। मुग़ल चित्रकलाकी यह उत्क़ृष्टतम कलाकृति असावधानीका ऐसा शिकार बनी है कि लेखन-प्रशस्ति व बहु- मूल्य चित्रका कुछ भाग नष्ट हो गया । सौभाग्यसे प्रशस्तिका जो आंशिक रूप बच सका, वह इस प्रकार है--




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