काव्य-मंजरी | Kavya-Manjari

Kavya-Manjari by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गोस्वामी तुलसीदास . | जन्म सवत्‌ १५५१] , ,, , , ल्यु सवत्‌ १६८० ~ कोद मनुष्य सुद्राश्रौ को अपना वित्त वतलाता है, कोई अपने बच्धु- चान्धवों को ही अपनी सम्पत्ति मान कर अत्यन्त असन्न होता ह | किन्तु किसी राष्ट्र अथवा जाति की सम्पत्ति के विषय में कोई क्या कह सकता है ! यथार्थ में देश की सम्पत्ति वे ही मनुष्य-जाति रूपी सागर में से मथ ` कर निकाले, हुए उज्ज्वल रत्न हैं, जो अपनी जीवन-ज्योति- से देश के मोहान्धकार करा विनाश करते ह | | | वसुन्धरा मं अ्रगणित वीर, साहसी, पंडित श्रौर कवि उत्तन्न ही चुके हैं; जिन्होंने अपनी प्रतिभा से अक्षय कीति अर्जित की है। भारतवर्ष भी स्वतः के आध्यात्म-विद्यावादियों, वीरों, भक्तों और कवियों का गये कर सकता है । कवियों मे कवि-सम्राद तुलसीदास अग्रगण्य हैं | ह अतिमाशाली महाकबि अपने समय का ' प्रतिनिधि होता है। जन- ` समांज के प्रतिनिधि के समान चह भी समाज की आ्रावश्यकताएँ बतलाता है, कवि ,कल्पना-बल से लोगा करे सामने एक शब्द-चित्र उपस्थित ^ करता है। जिसमें युगः की छाप रहती है। वह चित्र इतना चित्ताकर्षऊ होता दे कि उसकी ओर सभी स्वयं आक्ृष्ट हो! जाते हैं। उस समय का स्मरण कीजिये, जब नि्दंयता चरम सीमा पर पहुँच गई थी- _ अहंकार की बात तो क्‍या, कडी बात कहने पर्‌ भी प्रारादेर्ड की आज्ञा दी जाती थी । लोग मोहान्धकार मे मे ड्वे हुए थे। उसी समय भगवान्‌




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