राजा ओर प्रजा | Raja Or Praja

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Raja Or Praja by रवीन्द्रनाथ टैगोर - RAVINDRANATH TAGORE

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about रवीन्द्रनाथ टैगोर - Ravindranath Tagore

Add Infomation AboutRAVINDRANATH TAGORE

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
५ अँगरेज़ और भारतवासी । इसीमें अँगरेजोंका दोष है । वे किसी प्रकार घरमें ( ठिकानेपर ) आना ही नहीं चाहते । किन्तु दूर ही दूरसे, बाहर ही बाहरसे, सब ग्रकारका स्पस आदि तक भी बचाकर मनुष्यके साथ किसी प्रकारका व्यवहार नहीं किया जा सकता । आदमी जितना ही अधिक दूर रहता है उसको विफलता भी उतनी ही अधिक होती है । मनुष्य कोई जड़ यंत्र तो है ही नहीं, जो वह बाहरसे ही पहचान लिया जा सके । य्ह तक कि इस पतित भारतवर्षके भी एक हृदय है और उस हृदयको उसने अपने ओगरखेकी आस्तीनमे नही ख्टका रक्ला है । जड़ पदार्थको मी विज्ञानकी सहायतासे बईत अच्छी तरह पह- चानना पड़ता है और तभी जाकर जड़ प्रकृतिपर पूर्ण रूपसे अधि- कार किया जा सकता है । इस संसारमें जो ठोग अपने स्थायी प्रभा- वकी रक्षा करना चाहते हैँ उनके स्यि अन्यान्य अनेक गुणोके साथ साथ एक इस गुणका होना भी आवश्यक है कि वे मनुष्योंको बहुत अच्छी तरहसे पहचान सकें, उनके हृदयके भाव समझ सकें । मनुष्यके बहुत ही पास पहुँचनेके लिये जिस क्षमताकी आवश्यकता होनी है बह क्षमता बहुत ही दुछभ है । ऊँगरेजोंमें बहुत सी क्षमताएँ हैं किन्तु यही क्षमता नहीं है। वे बल्कि उपकार करनेसे पीछे न हटेंगे किन्तु किसी प्रकार म्ुष्यऊ पास जाना न चाहेंगे । वे किसी न किसी प्रकार उपकार करके चट- पट अपना पीछा छुड़ा लेंगे और तब क्लबमें जाकर शराब धी, बिठियड खेढेंगे और जिसके साथ उपकार करगे उसके सम्बन्धे अवज्ञाविषयक विशेषणोंका प्रयोग करते हुए उसके विजातीय दारीरकों -यथासाध्य अपने मनसे दूर कर देगे |




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now