राजस्थानी 1989 | Rajasthani 1989

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Rajasthani 1989 by जगदीश लालवानी - Jagdish Lalwani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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है. उत्तरी क्षेत्र मेवाड़ के मैदान या, वनाप्त वेसिन तथा दक्षिण भाम छप्पन मैदान कहलत्ति है, भरतपुर, सवाई माधोपुर, उदयपुर को पूर्वी भाग, परिचमी चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, श्रजमेर, टोंक, जयपुर तथा प्रलवर के दक्षिणी भाग बनास के झन्तगंत रखे जाते हैं जबकि दक्षिणी भाग एवं इ गरपुर जिले में छप्पन मेदान का विस्तार देखा जा सकता है. इस प्रदेश की भूमि श्रत्यन्त समतल होने के साथ ही कट नदियों दारा सिचित है जहां जलोढ़ मिट्ियों का निक्षेप हुभ्रा है, फलस्वरूप मिट्टियां उपजाऊ हैं, बनास, खारी, वेडघ. मोरल, माही, सावी, गंभीरी श्रादि नदियों के जल को कई स्थानों पर बांघों में एकत्रित कर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई गई है छप्पन मैदान में प्रवाह शक्ति की तीत्रता के कारण दक्षिण में नाईसी मेदान का ग्रधिक श्रपरदन हुश्रा है, फलस्वरूप भू-प्राकार का एक विलग रूप प्रदर्शित हुश्रा है, इस प्रदेश की प्र्व्यवस्था का प्राधार, कृषि, उद्योग धन्वे तथा पशुपालन है, गेह. ज्वार, त्तिलहन, दाले तथा वाजरा प्रमुख फसलें है, भरतपुर, सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा एवं उदयपुर श्रौद्योगिक रूप में विकसित हुवे है. दक्षिण-पुर्वो पठार--चम्बल नदी के सहारे राज्य का दक्षिसी-पूर्वी भाग हाड़ौती के पठार के नाम से भी जाना जाता है, इसमे कोटा, बन्दी, कालावाड ग्रौर चित्तौड़गढ़ जिले सम्मछित्त किए जाते हैं जिनका अधिकांश भाग चम्बल तथा उसकी सहायक नदियां कालीसिन्व तथा पार्वती द्वारा अपवाहित है. इस क्षेत्र के भौतिक स्वल्पो को दो उप विभागों में रखा जाता है; विच्घ्यनं कगार तथां दक्कन लावा पठार. विन्ध्यन कगार--यह भौतिक स्वरूप वनास एवं चम्बल नदियों के मध्य दक्षिण एवं दक्षिणपुवं कीश्रोर दष्टिगत होते हैं जो और प्रागे वुन्देल खण्ड त्क विस्तृत है, इन कगारो की ओौसत ऊंचाई 350 मी. से 500 मी. फे मघ्य पाई जाती है, कु कगार धौलपुर तथा करोली क्षेत्रों तक भी दुष्टिगत होते हैं. [ 15 दवकन लावा पठार--मध्य प्रदेश के विन्ध्याचक्त पठार का परिचमी भाग मध्यचर्ती जैल के साथ त्रि-पठार के रूपमे फेला है. दक्षिण पूर्वी राजस्थान की यह भौतिक आकृति 'पठार' (पथरीला) के नाम से जानी जाती है. इस क्षेत्र में कोटा-बु दी के पठारी भाग भी सम्मलित है. अपरदन की क्रियाने प्राचीन भूमि घरातल को प्रकट किया है. चम्बल तथा उसकी सहायक नदियों ने यहां एक कोप वेसिन का निर्माण किया है जो काफी उपजाऊ है. सामान्यत--राजस्थान के इस क्षेत्र में काली, कछारी ग्रौर लाल मिट्ियां पाई जाती है. श्रधिक वर्पा ओर प्राद्र नम जलवायु के कारण प्राकृतिक वनस्पति श्रौर वनों का वाहुल्य है. लम्बी घास, वांस, सैर, गूलर, सालर, घौक, सागवान इत्यादि के वृक्ष श्रघिक पाये जाते है. चम्बल घाटी योजना से इस क्षेत्र में सिंचाई का तीव्र विकास हुआ है. परिणामस्वरूप यहां कृषि फसलों में विविघता पाई जाती है. गेहूं, चावल, मक्का, ज्वार. तिलहन, दल- हन, कपास, तम्वाक्‌, गन्ना भ्रादि का गहन उत्पादन किया जाता है. जल विद्युत तथा श्रणु विद्युत सुविधा के फल- स्वरूप उद्योगों का तीव्र गति से विकास हो रहा है. कोटा राजस्थान का प्रमुख ग्रीद्योगिक नगर वन रहा है जहां रासायनिक, प्लास्टिक, कृचिम, रेशे, कपड़ा, विद्युत उप- करण मशीन निर्माण आदि उद्योगों का जाल सा विछ गया है. इसके भ्रतिरिक्त लाखेरी, चित्तोड़गढ़, निम्वाहेड़ा, राम- गंज मन्डी प्रादि श्रौद्योगिक केन्द्र भी इसी क्षेत्र में फैले है. प्रवाह प्रणाली --श्ररावली पर्वत श्रेणी ने राज्य की प्रवाह प्रणाली को भी दो भागों में विभक्त किया हैं. प्रथम बंगाल की खाड़ी की आर प्रवाहित होने वाली नदियां तथा दूसरी अरब सागर की शोर प्रवाहित नदियां मरुस्थ- लीय क्षेत्र में श्रन्त-स्थलीय प्रवाह पाया जाता है जो समुद्र तक नहीं पहुँच पाता राज्य में निम्नांकित प्रमुख नदियां पाई जाती हैं-- १. चम्बल नदौ सम्पूर्ण राज्य में केवल चस्वल् ही वेषं पर्यन्त प्रवाहित होने वाली है जौ मध्य प्रदेश मे मऊ के निकट विन्ध्याचल पवत के उत्तरी ढाल से निक सती है.




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