गौरमोहन | Gauramohan

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Gauramohan by रवीन्द्रनाथ ठाकुर - Ravindranath Thakur

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नौरमाहन । ७ शिष्टता के अनुकूल होगा या नहीं, यह सोच कर खड़ा हो रहा । गाड रवाना होत समय बटी चै सिर शुका कर विनय को अभिवादन क्रिया । विनय हतबुद्धि सा खड़ा था, इसलिए प्रयभिवादन न कर सका । घर आकर वह इसको अपनी भूल समभ बार बार अपने की धिक्ार देने लगा । इसके साय साथ विनयन भेट होने से बिदा होन तक कं श्रपने समस्त चरण का जब श्रालोचना करके दखा तब उसने आदि से अन्त तक अपना सारा व्यवहार श्रसभ्यता मे भरा पाया । किस समय में क्या करना उचित था, क्या बोलना उचित था, इन वातां को लेकर बह मनी मन भूठ मूठ का तक्र वितक करने लगा। घरक भीतर प्रवेश करक उमन दगा, जिस सुमाल से बालिका ने अपने बाप का मुँह पोंछा था वह रुमाल बिछौने पर पड़ा है । उसन भट उसे उठा लिया । उसके मन मं बैरागी के स्वर मे वह गीत गूँजने लगा-- इखो, एक श्रनाखा पक्षी अर शा कर उड़ जाता है । देस्वते ही दग्वते दस बजनें को हुए । वर्षा की धूप कड़ी हों उठी ।. गाड़ियों का खत्रोत बड़ वेग से ऑफिस की अर दौड़ चला । विनय का उस दिन किसी काम में जी न लगा । उसे श्रपना छोटा सा घर श्नौर चारों नार कलकत्ते कं बुर महल्लं मायामहल कौ भाति प्रतीत होने लगे । इस वषा- ऋतु क प्रभातकालिक सूयं की निर्मल प्रभा उसंक मस्तिष्क मे प्रवेश कर गई; वह उसके लद के भीतर प्रवाहित होने




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