मंजु | Manju

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : मंजु  - Manju
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्री गोपाल आचार्य - Shri Gopal Acharya

Add Infomation AboutShri Gopal Acharya

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
मनु ९६विचार जान लो ।गया मततब हेहो सबता हैं वह तुम्हारे साय चादी न वरे । यह में जानना हूँ बढ़ तुम्ह प्यार नहीं कर सकती । उसकी वाणी म दत्ता थी । चेहरे के भाव यथावन्‌ गभीर >!कख क्षण वे टिषएु कमरेम नन्ति दा 1 विमल मनु के चिन का दंखते ही गम्भीर हो गया था । यह तथ्य बिहारी से दिपा न था । वात की बातचीत ने सारे वातावरण का गम्भीर बना टिया 1मजु के पिपय मे मादूम हाता है तुम बटूत जानते हू ।मेरी उसमे दिलचस्पी है 1तुम इर साथ नाती कर मङेगौ ८यह मैं नहीं कह सकता। हम एक टूसर को प्रेम जरूर करत हैं । लुम श्रपनी माग जारो रख कर उस वटनास न बरी इसीलिय मैंने बुआ द्िगारा नहीं ।तुम्हें मजु प्यार करनी है ?“नम्र ॥सिवाय तुम्हारे ब्रौर कसा से नाता नहा करगौ ?मेरा यहां विश्वास है । मजवूरन गर उसे किसी श्रौर से शादी बरनी भी पड़ी तो भी वह उसकी नही हो सबती ।एवं “न पर मैं अपनी पसंद वार्षिस जे सकता हूँ विमत 1मैं उसे पूरा करन की काटिरा वस् गा ।में सिफ पानना चाहता हूँ कि तुम्हार मुवावने मे बह मरा शा सकेगी या नहीं । इसके दिये किसी बहान से वह हम लाना व अपने यहा युराय। कायत्रमं वं वीचमे मैं वहा से वापिस घर आने का यटाना करूगा। तुम्हें भी मर साथ ही एक वार उठ लाना होगा । मुझ इजाजत दर गर झाग्रहपूवक उसने तुम्ह रोक लिया तो में समझा कि बढ़ नुम्टारी है । पिताजा को मरा झासिरी निशय देन मे अभी पाय शित बाकों




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now