खुदा सही सलामत है | Kuda Sahi Salamat Hai

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Kuda Sahi Salamat Hai by रवीन्द्र कालिया - Ravindra Kaliya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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एक दिन पंछित शिवनारायण से महसुस किया कि उसकी स्पाति सिविल लारन्सम दूग-दरुर्‌ नक मल गयी है तो उसे अचानक अपनी बीबी आर बच्ची को ध्याप आया । उसने सोवा कि अब वक्त भा गा है लव चहु अपनी धर्म पा जार एकमात्ते बच्ची को देहात से बुला लाये । मगर पर्डित के पास नायास की उचित व्यवस्था नहीं थी । ले-देकर एक कोठरी थी, जिसमें मे तो कार्‌ ह्वा था, न सेशनद्धानं । पण्ठितादुन खुली हवा में रहते की आदो थी गह्मा ता उसकों यम घुठ जायेगा । दूसरे वह पंडिताइन को विश्व-सुन्दरी से कम नहीं समझता था जार मृहृल्ले के लो लपाड़ों के बारे में उसकी राय अर्छी सही थी 1 पश्मिइन आ गयी तो उसे दिन भर कोठरी में कैद 'रहना पढ़ेगा, पद्धति को दुद्ुटी का कई भरोसा सही था, जाने कब किस अफसर फे यहा से तरा था जाए कि नल बिगड़ गया है । हानि में ले दे कर एक छुअरी थी हू थी, जिससे पंडित की कभी-कभी दुआ-सलाम हो जाती थी । सच तो यह है कि हजरी थी ने ह्वाती तो पड़ित कभी का कोठरी छोड़ गया होता । पठि पोर छुंजरी बी. की कोठरिया एक ही हाने में थी । पडित अगर पानी सिंविस साउन्स में ही पड़ा रह जाता, तो हुजरी बी अगले रोज उस पर यगडही । पंडित को यह सब बहुत अच्छा लगता-नकोई तो £ उस समर्‌ भ, घा फम-सनक् उसकी खोज खबर रखता है । पंडित मे छुजरी बी से अपने गेके घर का जिक्र किया तो टुजरी ची बेहद खुश हो गयी, बोली, सुप्र था पंडित जी मापरकी' सर्दानिगी पर ही शुबद्धा होने लगा था । तुम भी रेते मदं ह्‌ गिः परस जपरनी मर्दानिगी पर लगाम लगाये रहते हो । सुभान गललादु, तुम्ह्‌ अकत तो आयी } पटितादन वचारी परक्या गुजरती होगी । कान में भी खुजली उठती है हो आदमी काड़ी-बाड़ी दूढ़ने लगता है 1” पंडिस को रगेदते 'रगदते हुजेरी को जानें बंयो चा कि सहसा ही रोते लगी, हमारे कमिकतर साहब तो एक बेनगाम भीडे की तरह थे । अस्लाह्‌ उमकी रुह कौ ममन बता करे




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