राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी | Rashtrabhasha Hindustani

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Rashtrabhasha Hindustani  by मोहनदास करमचंद गांधी - Mohandas Karamchand Gandhi ( Mahatma Gandhi )

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ राष्टुभाषा हिन्दुस्तानी यानी पढ़े-लिखे हिन्दू हिन्दीको केवल संस्कृतमय बना डालते हैं । नतीजा यह होता हैं कि कभी मुसलमान झुसे समझ नहीं पाते । लखनअूके मुसलमान भाओ फ़ारसीमय अदू बोकर असे असी शक्ल दे देते हैँ कि हिन्दू समझ न सकें । ये दोनों परभाषा हैं, और आम जनताके बीच शिनकी कोओी जगह नहीं । मैं अुत्तेरमें रहा हूँ, हिन्दुओं और मुसलमानों के साथ -खूब मिला हूँ, और हिन्दी साषाका मेरा अपना ज्ञान बहुत कस होने पर भी झुनके साथ व्यवहार करनेमें मुझे ज़रा भी अड्चन नहीं हुआ है । अुत्तरी हिन्दुस्तानमें जिस भाषाकों वहाँका जन-समाज बोलता है, झुसे आप चाहे अदू कं, चाहे हिन्दी, बात अक ही है । झु्दू लिपिमें लिखकर झुसे झुदूके नामसे पहचानिये, और झुन्हीं वाक्योंको नागरीमें लिखकर झुसे हिन्दी कह लीजिये । अब रहा सवाल छिपिका । फ़िलहाल मुसलमान लड़के रूर ही अद लिपिमें लिखेंगे । हिन्दू ज्यादातर देवनागरीमें लिखेंगे । “ ज़्यादातर * शब्दका प्रयोग भिसलिमि कर रहा हूँ कि हजारों हिन्दू आज सी अपनी हिन्दी यदू चिपिमे लिखते हैं, ओर कुछ तो जैसे हैं, जो देवनागरी लिपि जानते भी नहीं । आखिर जब हिन्दुओं और मुसलमानोंके बीच शंकाकी थोड़ी भी दृष्टि न रहेगी, जब अविश्वासके सब कारण दूर हो चुकेंगे, तब जिस लिपिंमें दाक्ति रहेगी, वह लिपि ज़्यादा लिखी जायगी और वह राष्ट्रीय लिपिं बनेगी । भिस बीच जिन मुसलमान और हिन्दू भाभि्योको अदू लिपिमें अर्जी लिखनेकी जिच्छा होगी, झुनकी अरज्ञी राष्ट्रके स्थानमें क़बूल की जायगी--की जानी चाहिये । पोच लक्षण धारण करनेमे हिन्दीकी होड करनेवाली दूसरी कोओी भाषा नहीं । हिन्दीके बादका स्थान बैंगलाकों प्राप्त है । तिस पर भी बेगाली भाओ बंगालके बाहर तो हिन्दीका ही झुपयोग करते हैं । हिन्दी बोलनेवाला जहँ जाता है, वहाँ हिन्दीका ही झुपयोग करता है, और अुससे किसीको आइचये नहीं होता । हिन्दी बोलनेवाले घर्म-प्रचारक और खुर्दके मौलवी . सारे दिन्दुस्तानमे अपने व्याख्यान दिन्दीमे ही देते है, ओर अनपढ़ जनता सी यसे समन्न ठेती है । अनपढ़ गुजराती भी झुत्तरमें जाकर हिन्दीका थोड़ा-बहुत जिस्तेमाल कर लेता है, जब कि अुत्तरका




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