रचना और आलोचना | Rachana Aur Aalochana

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Book Image : रचना और आलोचना  - Rachana Aur Aalochana
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ रचना श्रीर ध्रासोचनाकिसी नौ युग श्रौर समाज कौ स्तौमान्नौ का श्रतिक्रमण करने मे समर्थ होतो है । इती प्रकार साहित्य का विकास रचना श्रौर श्रालोचना कौ सम्बद्धा का हौ परियाम नहीं है, ्योकि झन्यान्य श्रन्तर-चाह्म स्यितियां भो उसे घंयटित फरतौ ह । श्रदश्य हौ रचन श्रालोचना के पारस्परिक सम्बन्धो को खोजसीन युग-जोवन के सद्म के द्रनाव में एकांगी होतों है ।रचयिता प्रायः श्रात्म विज्ञप्ति कस्ते ह ग्रौर श्रपनी प्रालोचना श्राप लिखते ह) समानधर्मा श्रालोचक के रभाव श्रयवा श्रात्मरति के आग्रह के कारण यह दनीचिल्य प्रत्यक होता है 1 वास्तव में रचयिता को श्रपनी छति में ही परिवुष्ट होना चाहिए, पर यशलिप्सा; मत्सर या व्यावसायिक प्रतिप्ठा के खातिर वह स्वयं घ्रालोचर का चाना भी घारण कर लेता है । वह ्रपनी साहित्य-दुप्टि या सैद्धान्तिक मात्यत्तात्रों के स्पप्टीकरण के लिये जव- तव लम्बी झालोचनायें भी लिखा करता है । इसे दुद्धिवादी युग का तकाजा समझा जाता है । श्रालोचना साहित्यानुभूति का वौद्धिक निरुपण होती श्रवश्य है, पर चह विशेष से सामान्य तक, श्रन्‌भूति से सिद्धान्त तकत श्रयवा छरति विशेय ते फति मात्र तक के सत्य का सन्धाने करती ह । यही बह व्यक्तिगत उपलब्धि को सार्वजनिक वस्तु श्रौर व्यापक सत्य के रूप में प्रकॉवित फरती है । समानधर्मा श्रालोचक की यहीं भूमिका होती है, झन्पया वह नये प्रतिमानों को सृष्टि करने में असफल हो जाता है श्रीर साहित्य की गति श्रवरुद्ध हो जाती है । जिस प्रकार व्यक्तिगत श्रनुभूत्ति को सर्वेसंवेद्य रूपाकार देनेंपर ही रययिता कृतकार्यं होता है, उसी प्रकार कृति विशेष से सम्बन्धित श्रपनी वैयक्तिक प्रतिक्रिया; धारणा या सारित्यानुमूति को जो ऋलोदक भ्रवृत्तिधारः, युग या साहित्य माद्र के स्त्य के निकप पर कस सेता है, उसी का फयन प्रमाण उन सत्ता ह } अतएव लेवकीय श्राल- सना प्रकृत्या व्यविंतगत वस्तु अधिक होती है श्रीर सार्वजनिक कम । उसका प्रमुख श्रावा- पण च्यदि्ति-सत्य का उद्घाटन होता है, फति का सा्वेजनिकत मूल्यांकन चहं ? इस स्थितिमे कचि श्नौर सामाजिक के सध्य श्रालोद्क का श्रस्तित्व श्रनावश्यक श्रौर ्रनुपयोगी समझ लिया जाता है 1समानधर्मा श्रालोचक का रचयिता के लाय प्रायः सीधा सस्चन्ध स्ापित हये जाता हू, पर यदि चहू सम्बच्ध सार्वजनिक न हुझा, शथदा रचयिता श्ौर श्ालोचक दोनों का पार- स्परिक ही नहीं सामाजिक ये साथ 'मी प्रत्यक्ष सम्चन्ध स्वापित न हो पाया था वह सम्बन्ध छिन्न-लिन्न हो गया, तो रचना और झालो चना दोनों हो पथ-झप्ट हो जाते हूं । स्पय्टतः रचना, झालोचना श्र सामाजिक तीनों में कहों झलगाव नहीं होना चाहिए ज्रर्थात इन्हें साहित्य षे त्रिकोन के रूप में परस्पर सम्बद्ध रहना चाहिये । इसी स्थिति मेंरचना श्र सालोदना दोनों छृत-कार्य हो सफती हैं सैर दोनों का समवेत विकास सी सम्भव होता है 1




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