नेपोलियन बोनापार्ट | Nepoliyan Bonapart

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Nepoliyan Bonapart by राधामोहन गोकुलजी - Radhamohan Gokual Jee

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ८ ) हो गई । नेपोलियन ने माताकेचु'बन करने के लिये आगे बढ़ कैर प्रसन्न वदन हो माथा मुकाया । माता ने उत्तर में कहा--“ हे वत्स ! एसा नही, देखो जिसके गभ से भूमिष्ट हो कर तुमने संसार देखा है, उसका कर चुन करके कतव्य पाटन द्वारा उसका सम्मान दिखाश्रो ।” माता ने परद्यपाणि फेलाए और नेपोलियन ने श्रद्धा भक्तिपूबक उन्हे चुबन कर प्रणाम किया । इतने से ही नेपो- लियन की माता के हृदय का भाव प्रकट होता है । नेपोलियन का जो प्रेम, उसकी जो भक्ति माता के प्रति थी उसका परिचय भी थोड़े शब्दों में हम करा देते हैं । जिस समय नेपोलियन सेंट हेलना में अंग्रेजों का बंदी था, कई बार ठंढी सांस भर कर वह कह उठता--'' हा माता, आप मुभे न जाने कितना प्यार करती थीं । मेरे निमित्त श्रापने अपना सवस्व--यहाँ तक कि अपने वख्र भी-- बेच डाले थे । ”” कभी कभी माता का प्रेम स्मरण करके वह पुलि- कत हो जाता, आँखों में आँसू भर कर कहने लगता--'“ हे मा ! सब प्रकार से सहाय्यदहीन होने पर भी हम लोगो के पालन पोषण का महत्‌ भार आपने सरल मन से अपने ऊपर उठा रखा था । आप का सा साहस, झापकी सी बुद्धि; आपकी सी चरित्र-गठन- शक्ति बिरली ही नारी में होती होगी, मेंने तो नहीं देखी । इस संसार में जो कुछ महत, उन्नत तथा उदार वस्तु है उस सब के.श्रापने हम सब बालकों के हृदय में प्रतिष्टित करने के लिये प्राणपण से चेष्टाकी थी । मिथ्या से तो श्रापको शोदिं क घुणा थी, उच्छू ख- लता देखने की आप में साम 'ध्य ही न थी । चाहे जितने कप्ट झाप पर




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