गीता माता | Geeta Mata

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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गीता-चोघ १५ उसमें राग पैदा हुश्रा, जिसे पराया जाना, उसमे द्ेष- वैरभाव श्रा गया । इसलिए भेरे-तेरे' का भेद भूलना , चाहिए, या यो कहिये किं राग-दवेषको तजना चाहिए) गीता श्रौर सभी घमे-ग्रथ पुकार-पुकारकर यही कटृते हँ । पर कहना एक बात है भर उसके श्रनुसार करना दूसरी बात । हमे गीता इसके श्रनुसार करनेकी भी दिक्षा देती है। कैसे, सो भ्रागे समभनेकी कोशिश की जायगी । दूसरा अध्याय सोमप्रभाति १७-११-३० भर्ुन को ज्नब कुछ चेत ग्रा तो भगवानने उसे उलाहना दिया श्रौर कहा कि यह मोह तुके कहास भ्रागया? तेरे-जंसे वीर पुरुषको यह शोभा नही देता । पर भ्र्जुनका मोहं यो टलनेवाला नही था। वहु लडनेसे इनकार करके बोला, “इन सगे-सबंधियो श्रौर गुरुजनोको मारकार, मूके राजपाट तो दरकिनार, स्वर्गका सुख भी नहीं चाहिए 1 मै कतेव्यविमूढ हो गया हू । इस स्थितिमे धमं क्या है, यह मुझे नहीं सूता । मै आपकी शरण हु, मे धमं बतलाइये {” इस भांति अर्जुनको वहत व्याकुल श्रौर जिनासु देखकर भगवानको दया प्राई। वह उसे समझाने




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