संसार और धर्म | Sansar Aur Dharm

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दिशामे और किस ध्येयकी तरफ दिया जाय । दोनो लेखकोकी विचार- सरणी स्पष्ट रूपसे कहती है कि पहले मानवंताके विकासकी ओर लक्ष्य दिया जायं ओर उसके अनुसार जीवन विताया जाय । मानवताके विकासका अथं ह -- आज तकं उसने जो जो सद्गुण जितनी मात्रामे साघे हं उनकी पूणं रूपसे रक्षा करना और उनकी मददसे उन्ही सद्गुणोमे ज्यादा शुद्धि करके नवीन सद्गुणोका विकास करना, जिससे मानव-मानवके बीच ददर ओर शत्नुताके तामसं बर प्रकट न होने पावे । इस तरह जितनी मात्रामे मानवता-विकासका ष्येय सिद्ध होता जायगा, उतनी मात्रामे समाज-जीवन सुसवादी और सुरीला वनता जायगा । उसका प्रासगिक फल सर्वभूत-हितमे ही आनेवाला है। इसलिए हरएक साघकके प्रयत्नकी मुख्य दिशा तो मानवताके सद्गुणोके विकासकी ही रहनी चाहिये। यह सिद्धात भी सामूहिक जीवनकी दृष्टिसि कमें- फलका नियम लागू करनेके विचारमें से ही फलित होता है। ऊपरकी विचारसरणी गृहस्थाश्रमको केन्द्रमे रखकर ही सामु- दायिक जीवनके साथ वैयक्तिक जीवनका सुमेल साघनेकी वात कहती है। यह एेसी सूचना है जिसका असल करनेसे गृहस्थाश्रममे ही बाकीके सब आश्रमोके सद्गुण साघनेका मौका मिल सकता है। क्योकि उसमे गृहस्थाश्रमका आदरे ही इस तरह वदल जाता है कि वह्‌ केवल भोगका घाम नं रहकर भोग ओर योगके सुमेरुका धाम बन जाता है। इस- लिए गृहस्थाश्रमसे अलग अन्य आश्रमोका विचार करनेकी गुजाइश ही नहीं रहती । गृहस्थाश्रम ही चारो आश्रमोके समग्र जीवनका प्रतीक बन जाता है। और वही नैसर्गिक भी है। श्री मणरूवालाका एक निराला व्यक्तित्व उनके इन लेखोसे प्रकट होता है । इन लेखोके पठन और मननसे मुझे यह विश्वास हो गया है कि उनमें किसी अन्त प्रज्ञाकी अखण्ड घारा बहती रहती है। यह चित्त- शुद्धिकी साधनाकी विशिष्ट भूमिकामें प्रकट होनेवाला सत्यमुखी प्रज्ञोदय है। उनकी कुछ लाक्षणिकताये तो सवथा चकित कर देनेवाली होती है। जब वे तत्त्व-चिन्तनके गहरे प्रदेगमें उतर कर अपनी वातकों स्पप्ट करनेके लिए किसी उपमाका प्रयोग करते है, तव वह पूर्णोपमाकी ९७




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