अभिजन और समाज | Abhijan Aur Samaj
श्रेणी : राजनीति / Politics

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
145
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)अभिजनं जवधारणा और सिद्धात 11विभिन भयात मानने थे ।** इस प्रकार के सिद्धाता वे सामाजिव पर्यावरण का
वणन जौ° सुकावस ने वहुत वारीकी वे साथ किया है । उसका मत ह वि
राजनीतिक नंतृत्व की समस्या समाजशास्तिया मे ठीक उ ही देशा म उठाई जा
थाय वुजुजा लवतत की स्थापना वरने मे विफल रह गए ये (अथातजिनम समती तत्व विशेष तौर पर सशक्त ये), भौर वह मेवस ववर वी
श्ररि्मा' (चमत्वार) सवधौ धारणा (जमनी म) ओर परतो इ अभिजन
धारणा (इटली म) का इम प्रकार के प्रयास की एक समान औरविलक्षण अभिव्यक्ति मानता है 1०अभिजनो और लोक्तव्र वेः विचारो दे विरोध को दो प्रकार से अभिव्यकन क्या
जा सक्ताटै 1 अभिजन सिद्धातो मे व्यवितगत क्षमताओं की विपमताञंपर जो बल दिया जाता है वह् लोक्तत्रीय राजनीतिक चितन वी इस मूल धारणा
के विपरीत है वि व्यक्तिया मे मौलिक समानता होती दै, गौर 2 नल्पसस्यक
शासक वग वौ कट्पना बहुसस्या बे शासन क लोकतत्रीय धारणा का खंडन
करती दहै । लेिन यह् भगिवाय नही है वि यह् विरोध हर स्थिति में उतना ही
कठोर और हद दर्जे वा हो जितना कि वह ऊपर से दिाङ् देताहै । यदि लाकतत
क्य बुनियादी तौर पर एवः राजनीतिक व्यवस्था मान लिया जाए तो यह कहा
जा सकता है कि जनता द्वारा शासन” (अर्थात बहुसप्या द्वारा प्रभावशालीरीति से शासन का सचालन) व्यवहार मे असभव हैं तथा राजनीतिक लोकतत्
वा बुनियादी महत्व इस वात म॑ निहित है कि सैद्धातिक दप्टि से सत्ता केप्रद सवे लिए खुले हैं, सत्ता के लिए होड होती है तथा सत्ताधारी एव' निश्चित
समय पर निर्वाचका वे' प्रति उत्तरदायी होते है। शुपीटर ने लॉकतत्र की यही
कल्पना प्रस्तुत की थी जिसे व्यापक तौर पर स्वीकार किया गया । उसने
लोक्तत्नीय पद्धति वी परिभाषा करते हुए कहा था नि वह् राजनीतिक निणया
पर पहुंचने की ऐसी सस्थात्मक व्यवस्था है जिसम जनता के वोट (मत) केलिए प्रतिस्पर्धात्मक सघप के द्वारा व्यक्तिया का निणय करने वी सत्ता प्राप्त हो
जाती है! ~+ इमी प्रकार काल मानहाइम ने भी अभिजन धारणा को लोक्तत्रके साथ सुमगत मान लिया हालाकि शुरू में उसन उ हू प्रत्यक्ष कायवाही तथा
नेता के प्रति विना शत आघीनता० बै भाव को सही सिद्ध करने कै अविवेकपूण
भयास वतताया था । उसने कहा नीति का वास्तविक निर्धारण अभिजनोके हाथो मे है लेक्नि इसका यह अथ नही है कि समाज लोक्तत्नीय नही है।
लोक्तत बै लिए इतना पर्याप्त होता है कि यद्यपि व्यक्तिगत तौर पर नागरिका
को हर समय सरकार में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने का अवसर नही मिततातथापि कम से कम इस वात की सभावना वनी रहती है कि बे निश्चित अवधिया
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