भारतीय युध्द | Bhartiya Yuddh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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परला प्रकरण । २६३ युद्ध निश्चित छुआ । ङपाचा्यं ने श्रागे आकर च्रजैन का नाम, कुल और मा वाप के नासौ का उ्ार किया; तथा उन्होंने थि- कारपूर्वक कर्ण से कहा, “ तू सी झपने साबाप के नास श्रौर कुल का उच्चार करः; दीन कुल म जन्मे इए श्रौर राजपद से रदित किसी पुरुषस भी श्रङधेन के समान राजपुत्र युद्ध तरी करेगा ! ” यदह वात सुनते ही दुर्योधन बोला, ” राजाओं की. योग्यता जन्म, शूरतः श्रौर सेनानायकी तीन गुणों से ठदद- राई जाती है; केवल उत्तम कुल मे ही जन्म लेने से योग्यता नहीं आती । सजपद-राहित क्षत्रिय के साथ यदि युद्ध न करना दो तो में अभी कर्ण को राजा बनाता हूं।” इतना कहकर उसने तत्काल झंगदेश का राज्य करण को दिया श्र वच्ीं का वदी उसे सज्यासिपिक सी कर दिया ! उस समय क्णंने यद्द्‌ शपथ की कि ्रामरण दुयोधन का पत्त न छोडगा ! इतने स्स मे कणे का दद्ध पिता ्राधिरय, दाप मे लकड़ीका सहारा लिए इपः, वदं श्रा पर्हुचा । उसे देखते ही कणं ने धञुषवाण्‌ नीचे रख दिया श्ौर राज्याशिषेक से भींगा हुआ सिर उसके चरण पर रखा । इस प्रकार उसका ाशीवांद लेकर कर्ण युद्ध के लिए तैयार इच्मा ! यद देखते दी भीम अगे वट्‌ कर बोले, “श्रे कणे, रंगदेष् का राजकाज सम्दालने का तुमे सामथ्यं नदीं हे; यजदर्ड दाय म लेकर राज्य-शकर चलाने कमै छपेच्ता, श्चयवा धघनुप-वाण लेकर युद्ध करने की अपेक्षा तू झपना परदले का चावुक दाथ में लेकर काठ का रथ दांकने काटी काम करः! > मीम के सुख खे यद वचन सुनकर कर्ण ने सिफ एक लम्बी सांस लेकर सूयं की शरोर देखा; परन्ठ यान ने दस पर यद्ट उत्तर दिया; ” क्षत्रियों का मुख्य गुण उत्तम कुल नदीं हे, किन्तु शृरता दी उनका सव से वड़ा . मुख्य युण है । शएख लेकर क्षी जद श्रागे वद रहा है तच




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