शिक्षा और भारतीय लोकतंत्र | Shiksha aur Bharatiya Loktantra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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७इसके वाद लक ने व्यक्तिवाद की मौर पुष्टि की, उसने कहा कि व्यक्ति बिलकुल स्वतन्त्र और स्वाघीन है । व्यक्ति ही अपने जन्तरा- वलोकन के आधार पर यह निदचय करेगा कि उसका धर्म सही हैँ या गलत । मानसिक पदार्थों में बर्यादु पुरुषों में कोई ऐसा तत्व नहीं है कि जो एक दुसरे में किसी प्रकार का सम्बन्ध स्वापित कर राज्य की आवश्यकता को सिद्ध कर सके । लॉक के दो वुनियादी सिद्धान्त थे: १. सब व्यक्ति विलकुल स्वतन्त्र और वरावर है २. राज्य की उत्पत्ति ओर वुनियाद शासितो की इच्छा पर निर्भर है । पदिचमी सभ्यता की बुनियाद; विशेषकर सयुक्त राष्ट्र अमेरिका की, इस व्यर्क्तिवाद के सिद्धान्तो पर आश्रित है । ६इसलिये हम देखते हँ किं परिचमी लोकतन्त्रो मेँ यह विचार वरा- वर रहा है कि व्यक्ति समाज में विलकुल समा नही जाता ह भौर समाज भी व्यक्ति का पुरा लेखा नही दे सकता है । कुछ मर्यो मे व्यक्ति सदैव अपने आपको समाज से अलग रखता है । यदि वह समाज में पूर्ण- तया मिलना भी चाहे या समाज को अपना आत्मसमर्पण कर दे तव भी वह अपना व्यक्तित्व कायम रखता है । व्यक्ति जीवित पदार्थों के सुधषम कोषो की तरह नही हं परन्तु वह्‌ हमेशा स्वतन् रूप से अपने जाप को गत्ति देता ह । जव वह॒ समाज के लक्ष्यो को पूरा करता हं उन समय वह अपने लक्ष्य को भी प्राप्त करता ह 1 वह्‌ जव और लोगो से मिलता है उस समय भी उसका व्यक्तित्व अलग ही रहता ह । उनके सपने लक्ष्य, भावनाएँ, और विचार होते है जो समूह के साय मेल नही खाते । हममें छोटे से छोटे और वड़े से वडे व्यक्ति का निजी जीवन होता हैँ । ७६. ए, 3, ¢, ंजफा०७: उप ऐपटटिएट ० &85६ 27 सेट, ९. 70-102.७. र. भ. कधिव्लर्लः 06 पल ज (गला ए 412.




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