शिक्षा और भारतीय लोकतंत्र | Shiksha aur Bharatiya Loktantra
श्रेणी : भारत / India, शिक्षा / Education

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
150
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)७इसके वाद लक ने व्यक्तिवाद की मौर पुष्टि की, उसने कहा कि
व्यक्ति बिलकुल स्वतन्त्र और स्वाघीन है । व्यक्ति ही अपने जन्तरा-
वलोकन के आधार पर यह निदचय करेगा कि उसका धर्म सही हैँ या
गलत । मानसिक पदार्थों में बर्यादु पुरुषों में कोई ऐसा तत्व नहीं है
कि जो एक दुसरे में किसी प्रकार का सम्बन्ध स्वापित कर राज्य की
आवश्यकता को सिद्ध कर सके । लॉक के दो वुनियादी सिद्धान्त थे:
१. सब व्यक्ति विलकुल स्वतन्त्र और वरावर है २. राज्य की उत्पत्ति
ओर वुनियाद शासितो की इच्छा पर निर्भर है । पदिचमी सभ्यता की
बुनियाद; विशेषकर सयुक्त राष्ट्र अमेरिका की, इस व्यर्क्तिवाद के
सिद्धान्तो पर आश्रित है । ६इसलिये हम देखते हँ किं परिचमी लोकतन्त्रो मेँ यह विचार वरा-
वर रहा है कि व्यक्ति समाज में विलकुल समा नही जाता ह भौर
समाज भी व्यक्ति का पुरा लेखा नही दे सकता है । कुछ मर्यो मे व्यक्ति
सदैव अपने आपको समाज से अलग रखता है । यदि वह समाज में पूर्ण-
तया मिलना भी चाहे या समाज को अपना आत्मसमर्पण कर दे तव भी
वह अपना व्यक्तित्व कायम रखता है । व्यक्ति जीवित पदार्थों के सुधषम
कोषो की तरह नही हं परन्तु वह् हमेशा स्वतन् रूप से अपने जाप को
गत्ति देता ह । जव वह॒ समाज के लक्ष्यो को पूरा करता हं उन समय
वह अपने लक्ष्य को भी प्राप्त करता ह 1 वह् जव और लोगो से मिलता
है उस समय भी उसका व्यक्तित्व अलग ही रहता ह । उनके सपने
लक्ष्य, भावनाएँ, और विचार होते है जो समूह के साय मेल नही खाते ।
हममें छोटे से छोटे और वड़े से वडे व्यक्ति का निजी जीवन होता हैँ । ७६. ए, 3, ¢, ंजफा०७: उप ऐपटटिएट ० &85६ 27 सेट,
९. 70-102.७. र. भ. कधिव्लर्लः 06 पल ज (गला ए 412.
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